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Supreme Court upholds Insolvency and Bankruptcy Code
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दिवाला कानून को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी, IBC की संवैधानिकता रहेगी बरकरार

सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार को अपनी संपूर्णता और संवैधानिक वैधता में दिवाला और दिवालियापन संहिता 2016 (आईबीसी) को बरकरार रखा |

AKANKSHA MISHRA

AKANKSHA MISHRA

नई दिल्ली: सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार को अपनी संपूर्णता और संवैधानिक वैधता में दिवाला और दिवालियापन संहिता 2016 (आईबीसी) को बरकरार रखा, जिससे ऑपरेशनल लेनदारों को एक झटका लगा है, जिसमें आपूर्तिकर्ता, ग्राहक और ठेकेदार शामिल हैं। न्यायमूर्ति रोहिंटन एफ. नरीमन की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने आईबीसी को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर फैसला देते हुए परिचालन लेनदारों को वित्तीय लेनदारों के समान सुविधाएं देने की दलीलों को अस्वीकार कर दिया।

परिचालन लेनदार चाहते थे कि उनके साथ बैंकों और वित्तीय संस्थान जैसे सुरक्षित लेनदारों जैसा व्यवहार किया जाए, जो पहले दिवालिया कानून के तहत कार्यवाही के माध्यम से आने वाले धन पर दावा करते हैं।

न्यायमूर्ति आर. एफ. नरीमन की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि वे ‘संपूर्णता' में इसकी संवैधानिक वैधता को मान्यता देते हैं। कोर्ट ने 16 जनवरी को इस पर फैसला सुरक्षित रखा था। हालांकि कोर्ट ने यह साफ किया कि अधिनियम में संबंधित पक्ष से आशय कारोबार से जुड़ा कोई व्यक्ति होना चाहिए। इसी के साथ न्यायालय ने कई कंपनियों द्वारा आईबीसी के कई प्रावधानों को चुनौती देने वाली तमाम याचिकाओं को खारिज कर दिया।

कोर्ट के मुताबिक कानून में एकमात्र बदलाव संबंधित व्यक्ति की परिभाषा में होगा। नई परिभाषा के मुताबिक वहीं व्यक्ति संबंधित व्यक्ति माना जाएगा, जो कर्जदाता या डिफॉल्ट कर चुकी कंपनी से संबंधित होगा। आपको बता दें कि आईबीसी यानी दिवालिया कानून को जून 2017 में लाया गया था, जब आरबीआई ने बैंकों को ये निर्देश दिए थे कि वे 12 बड़े कर्जदारों का मामला नेशनल कंपनी लॉ ट्रीब्यूनल में ले जाएं। बैंकों के बकाया 8 लाख करोड़ रुपये का करीब 25 प्रतिशत हिस्सा इन 12 कंपनियों पर बाकी था। इनमें से केवल पांच का मामला अब तक सुलझ पाया है। फैसले ने संहिता की धारा 29ए को बरकरार रखा, जो एक कंपनी के प्रमोटरों को अपने नियंत्रण को पुन: प्राप्त करने के लिए बोली लगाने से दिवालियापन की कार्रवाई का सामना करने से रोकती है।

--आईएएनएस