ज्योतिरादित्य ने बुझाई कांग्रेस की लौ, मध्यप्रदेश में बदलाव के बड़े आसार।

मप्र इन दिनों बहुत बड़े राजनीतिक बदलाव के दौर से गुजर रहा है, राजनीतिक पंडित इसे अचानक से आया हुआ बदलाव मानने के लिए तैयार ही नहीं है। लोगों के अनुसार इसकी पटकथा चुनाव के समय ही लिखी जा चुकी थी। 
ज्योतिरादित्य ने बुझाई कांग्रेस की लौ, मध्यप्रदेश में बदलाव के बड़े आसार।
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किसी ने पीसा और किसी ने उठाया :

भले ही कमलनाथ का मध्यप्रदेश की राजनीति में लंबा अनुभव रहा हो लेकिन अगर मध्यप्रदेश के चुनावों की बात करें तो इस चुनाव में जमीनी मजबूती के साथ कार्यकर्ताओं के साथ किसी ने कांग्रेस को मध्यप्रदेश में दोबारा खड़ा किया तो इसमें पक्का श्रेय ज्योतिरादित्य सिंधिया को जाता है। लेकिन जैसे ही चुनाव परिणाम आये तो मुख्यमंत्री के लिए चेहरे की तलाश के लिए खेमे आगे आने लगे और इसमे में भी ज्योतिरादित्य का पडला भारी था। चुनाव के पहले से ही मुख्यमंत्री की कुर्सी का ख्वाब देखने वाले मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह जहाँ एक ओर अपना राग अलाप रहे थे वहीँ अचानक से कमलनाथ को मध्यप्रदेश की जमीनी राजनीति में हेलीकॉप्टर से उतार कर मुख्यमंत्री बनाया गया। लोगों की माने तो इस जगह वही पुरानी कहावत चरितार्थ हुई कि रात भर किसी और ने पीसा और किसी और ने उठाया।

मान मनोवल के बाद एकीकरण :

चुनाव के बाद ही राजनीतिक धड़ो को साधने के लिए कांग्रेस में जद्दोजहद लंबी खिंची हर खेमे को संभालने के लिए कांग्रेस के पुराने इतिहास की दुहाई दी गयी और आखिरकार मामला पटरी पर आया। लेकिन जो चिंगारी सुलग रही थी उसे कांग्रेस का दिल्ली नेतृत्व न तो समझ पाया और न ही उसे बुझाने की कोशिश हुई जिसका नतीजा 2020 के होली के दिन नजर आया। मध्यप्रदेश में कांग्रेस का युवा नेतृत्व अपने खेमे के साथ बगावत पर उतर गया।

इस्तीफों की झड़ी लग गयी :

एक ओर जहां कमलनाथ उज्जैन के महाकाल की आरती के वक्त लाउडस्पीकर बंद कराने में व्यस्त थे तभी ज्योतिरादित्य अपने खेमे के विधायकों और मंत्रियों को यह समाझने में जुटे हुए थे कि अगला कदम बेहद उम्दा रहेगा, और ज्योतिरादित्य सफल भी हुए। एक साथ ज्योतिरादित्य के संगी साथियों ने अपने पद और कांग्रेस पार्टी को 9 मार्च के दिन स्तीफा सौंप दिया। और इस बात की पुष्टि हो गयी कि सिंधिया खानदान का आखिरी व्यक्ति जो कांग्रेस के दल में झंडा थामे चल रहा था वह अब भाजपा में शामिल होगा।

भाजपा तय करने में जुटी कि चेहरा कौन होगा :

इस्तीफों की झड़ी के बाद यह सुनिश्चित हो गया कि ज्योतिरादित्य के लिए दूसरा राजनीतिक विकल्प केवल भाजपा है। लेकिन अब असल समस्या और परीक्षा की घड़ी भाजपा के लिए है कि आखिर मुख्यमंत्री का पद किसे दिया जाए? मामा शिवराज सिंह या फिर ज्योतिरादित्य, क्योंकि दोनो को साथ रखना न सिर्फ मजबूरी है बल्कि बेहद जरूरी है। इसलिए संभावना है कि मध्यप्रदेश में भी दो मुख्यमंत्री वाली सरकार बने और कयास लगाए जा रहे है कि सरकार शिवराज सिंह को मुख्यमंत्री पद पर काबिज कराए और उपमुख्यमंत्री के लिए ज्योतिरादित्य निश्चित किये जायें वही सूत्रों के अनुसार यह भी बताया जा रहा है कि हो सकता है कि ज्योतिरादित्य के लिए केंद्र के दरवाजे खोले जाये।

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उदय बुलेटिन
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