पेट दर्द को हल्के में ना लें  
पेट दर्द को हल्के में ना लें  |Google
लाइफस्टाइल

अगर आपको भी होता है पेट में हल्का-हल्का दर्द, तो आज ही डॉक्टर के पास जाए 

पेट है जादू का बक्सा। 

AKANKSHA MISHRA

AKANKSHA MISHRA

चिकित्सा विज्ञान की भाषा में पेट को "जादू का बक्सा" कहा जाता है। इसे यह नाम देने के पीछे तर्क दिया गया है कि पेट में क्या चल रहा है उसे ना उपर से देखा जा सकता है और ना मालूम किया जा सकता है। पेट की बीमारी पता करने के लिए हम चाहे या ना चाहे हमें अल्ट्रासाउंड या सिटी स्कैन की मदद लेनी पड़ती है। इसलिए हम कई बार पेट दर्द को हल्के में ले लेते हैं।

लेकिन चिकित्सा विज्ञान के अनुसार पेट के दर्द को कभी भी हल्के में नहीं लेना चाहिए। कई बार हमारी लापरवाही हमारे लिए मुसीबत बन सकती है। डॉक्टर्स के अनुसार गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल कैंसर के मरीज (यानी पेट की आंतों या पेट के कैंसर) भारत में चौथा सबसे ज्यादा संख्या में पाए जाते हैं। भारत में पिछले साल जीआई कैंसर के 57,394 मामले सामने आए थे। यह कैंसर महिलाओं की तुलना में पुरुषों को ज्यादा प्रभावित करता है।

क्यों होता है गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल कैंसर ?

चिकित्सक बताते हैं कि जीआइ कैंसर के ज्यादातर मरीजों को शुरुआत में गैर-विशिष्ट लक्षण होते हैं, जैसे पेट दर्द और असहजता होना, लगातार अपच बने रहना, मलोत्सर्ग की आदत में गड़बड़ी होना। जिसके बाद यह साइलेंट किलर के रूप में धीरे-धीरे बढ़ता जाता है और शरीर के आंतरिक अंगों जैसे बड़ी आंत, मलाशय, भोजन की नली, पेट, गुर्दे, पित्ताशय की थैली, पैनक्रियाज या पाचक ग्रंथि, छोटी आंत, अपेंडिक्स और गुदा को प्रभावित करता है।

बीमारी की पहचान

मेदांता-द मेडिसिटी में इंस्टिट्यूट ऑफ डाइजेस्टिव एंड हेपोटोबिलरी साइंसेज में गैस्ट्रोइंट्रोलॉजी के निदेशक डॉ. राजेश पुरी का कहना है, "हमें जीआई कैंसर की प्रकृति के संबंध में जागरूकता और इसका जल्दी से जल्दी पता लगाने के लिए जांच कार्यक्रमों की उपलब्धता की काफी आवश्यकता है।

अपर जीआई की स्क्रीनिंग, कोलोनोस्कोपी और एनबीआई एंडोस्कोपी की मदद से जीआई कैंसर का जल्द से जल्द पता लगाने में मदद मिलती है।

प्रतिरोधी पीलिया और पित्ताशय की थैली में कैंसर की पुष्टि सीटी स्कैन, एमआरआई और ईआरसीपी से नहीं होती।

मेडिकल दखल जैसे कोलनगियोस्कोपी की मदद से कैंसर को देखने और उनके ऊतकों का परीक्षण करने में मदद मिलती है।

इससे पित्ताशय की थैली के कैंसर का जल्द पता लगाया जा सकता है, जिसका किसी परंपरागत उपकरण या रूटीन जांच से इस कैंसर का पता नहीं लगाया जा सकता।"

उपाय

डॉक्टर कहते हैं इस बीमारी का इलाज जितनी जल्दी करा लें उतना अच्छा है। लेकिन कई बार इस बीमारी का पता नहीं चलता। इसलिए सही समय पर इलाज शुरू नहीं हो पता। बहुत से लोगों को इसका पता तभी चलता है जब कैंसर दूसरे या तीसरे स्टेज पर पहुंच जाता है।

उदय बुलेटिन के साथ फेसबुक और ट्विटर जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

उदय बुलेटिन
www.udaybulletin.com