Riots in malmo sweden
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विदेश

आखिर विश्वभर में मुस्लिम क्यों चर्चा का विषय है, ताजा मामला स्वीडन से जुड़ा है, इन सभी मुद्दों पर आत्ममंथन की जरूरत है

विशेष समुदाय के लोगों ने पूरी दुनिया में आतंक फैला रखा है, आसमानी किताब जला देने पर शहर के शहर जला देते हैं। क्या धर्म इंसानियत से बढ़कर है?

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

भारत मे मुस्लिमों को लेकर दार्शनिकों और बुद्धिजीवियों के द्वारा खतरे में होने की बात कही जाती है। भारत मे लंबे वक्त से बहुसंख्यक समुदाय द्वारा प्रताड़ित करने के दावे किए जाते है। लेकिन इसके पीछे की असल कहानी क्या है, भारत मे मुस्लिम सदियों से रहते आ रहे है लेकिन अब भारत ही क्या दुनिया भर में मुस्लिमों को लेकर दृष्टिकोण बदल रहा है और इसके मुख्य कारक है दुनिया भर में होने वाली घटनाएं जो पूरे समुदाय को दोषी मानने लगी है।

जल उठा स्वीडन:

स्वीडन एक ऐसा देश जो लंबे वक्त तक दुनिया के लिए आकर्षण का केंद्र बना रहा और फिर स्वीडन का नया चेहरा चर्चा में है और इस बार का विषय है जलता हुआ स्वीडन। हालांकि स्वीडन एक दम से जलना शुरू नहीं हुआ बल्कि इसके पीछे एक बड़ा और व्यापक कारण है और इस मामले की शुरुआत हुई दो बच्चों के अप्राकृतिक यौनाचार और मारपीट के बाद। दरअसल स्वीडन में दो नाबालिगों के साथ मुस्लिम समाज के लोगों द्वारा दुष्कर्म करने का आरोप लगा और रिपोर्ट् में पुष्टि भी हुई। इसके बाद अन्य लोगों ने समुदाय विशेष के विरोध में समुदाय विशेष की पाक किताब को सांकेतिक विरोध के तौर पर आग के हवाले कर दिया और उसके बाद ही दूसरे मामले की कहानी शुरू हो गयी। दरअसल स्वीडन के मुस्लिम समाज ने धार्मिक हमले की तरह लिया और विरोध की आग को अलग तरीके से प्रदर्शित करने के लिए स्वीडन की शांति को आग के हवाले कर दिया।

धार्मिक आधार पर लोगों को भड़काया गया:

दरअसल पाक कुरान को जलाने के बाद मुस्लिम समाज ने इस बाबत एक मुहिम चलाई और इसे धर्म पर किये गए हमले की तरह प्रसारित किया गया। नतीजन हजारों की भीड़ जिसमें युवा, बुजुर्ग, बच्चे, लड़के, महिलाएं इत्यादि शामिल हुए और समाज मे अपनी उपस्थिति महसूस कराने के लिए आग और पत्थरों का सहारा लिया। बिल्डिगों और वाहनों को आग के हवाले किया गया और धार्मिक नारों से लोगों तक अपनी आवाज पहुँचाने का प्रयास किया गया।

अगर स्वीडन में धार्मिक आधार पर आबादी का विश्लेषण किया जाए तो करीब एक करोड़ के आसपास की कुल आबादी में करीब 10 प्रतिशत से ज्यादा मुस्लिम समुदाय है जो एक प्रकार से 10 लाख के आसपास ठहरता है। आंकड़े इसलिए स्पष्ट नहीं है कि पिछले कुछ वर्षों से स्वीडन के लोगों द्वारा धार्मिक जंग (सीरिया आईएसआईएस) में भाग लेने के बाद सही आंकड़े उपलब्ध नहीं हो पा रहे है।

क्या यह धार्मिक हमला था:

सबसे पहले हमें दोनों पक्षो को बराबर रखकर एक साफ नजरिये से सोचना पड़ेगा। इस नए मामले की शुरुआत कहां से हुई, दो नाबालिगों के साथ दुष्कर्म होने से, और इसमें दूसरा मोड़ कब आया जब कुछ लोगों ने आसमानी किताब को आग के हवाले किया। यहां एक बात देखने लायक है कि इन दोनो मामलों में यह कृत्य महज कुछ लोगों द्वारा किया गया। मसलन दुष्कर्म कुछ लोगों ने किया और धार्मिक पुस्तक कुछ लोगों ने जलाई जिसको लेकर कानून शायद अपना काम कर रहा होगा। लेकिन इसके बाद क्या हुआ, भीड़ जुटाई गयी, सुनियोजित तरीके से आगजनी की गई ताकि लोगों के दिलो में ख़ौफ़ भरा जा सके।

लोगों ने नसीरूद्दीन शाह को भी आड़े हाथों लेना शुरू कर दिया है:

पहला मामला नही है :

7 जनवरी 2015 का दिन, समय था दिन का 11:30 मिनट फ्रांस की प्रमुख पत्रिका शॉर्ली एब्दो के कार्यालय पर दो हथियार बंद हत्यारों ने हमला कर दिया लोगों को गोलियों से भूनना शुरू किया इस हमले में करीब 12 लोगों को जान से हाँथ धोना पड़ा और जाने कितने ही लोग जीवन भर के लिए अपाहिज हो गए। खैर इस मामले में भी पक्का वाला धार्मिक एंगल था दरअसल इससे पहले शॉर्ली ने अपनी मैगजीन में मुस्लिम धर्म के पैगम्बर मुहम्मद साहब का कार्टून छापा था जिसके तहत सबक सिखाने के लिए इस हमले को अंजाम दिया गया। इस मामले के बाद दुनिया मे कई तरह की बहसें छिड़ी, जिसको लेकर भारत मे भी चर्चाएं हुई। उस वक्त महशूर चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन द्वारा तमाम हिन्दू देवी देवताओं का नग्न चित्र बनाने को लेकर भी बहस हुई, हालकि इतना सब करने के बाद भी मकबूल को एक दिन के लिए भी न तो जेल हुई न ही आगजनी, न ही शहरों का अमन छीना गया।

भारत मे भी हो चुका है ऐसा ही मामला:

बीते दिनों की ही तो बात है बैंगलोर के कांग्रेस नेता के रिश्तेदार ने एक पोस्ट के जवाब में समुदाय विशेष के धर्म पर टिप्पणी कर दी जिसके बाद दुनियाभर में आईटी हब के रूप में जाना जाने वाला शहर दंगे के लिए जाना जाने लगा और धार्मिक मतान्ध भीड़ ने थाने समेत कई वाहनों को आग के हवाले कर दिया। हालांकि मामले में विपक्ष के नेता होने की वजह से कोई बड़ा बवाल नहीं हुआ वरना सत्ता के गलियारों में इसको अलग रंग दे दिया जाता।

लोगों के द्वारा समुदाय विशेष पर तंज कसे जा रहे है......

क्या यह जायज है?

अगर दुनिया के सभी देशों को देखा जाए तो लगभग सभी जगहों पर कानून का राज्य है और खासकर मुस्लिम देशों को छोड़कर सभी अन्य देशों में लोकतंत्र जैसी चीज उपस्थित है और अपराध में न्याय की समरसता के लिए लोकतंत्र सबसे सरल साधन है लेकिन अगर आप धार्मिक आजादी और विरोध की बात करें तो मुस्लिम राष्ट्रों में यह असमानता लगातार देखने को मिलती है। खासकर अगर आप मुस्लिम देशों में मुस्लिम धर्म गुरुओं और पैगम्बर के ऊपर निशाना साधते है तो आपको हर हाल में ईशनिंदा के तहत मौत मिलेगी। वहीँ अगर इसी तरह की प्रव्रत्ति अन्य धर्म के ऊपर होती है तो उसे सामान्य करार दिया जाता है।

आखिर स्वीडन में ये कहानी रची कैसे गयी?

मजे की बात तो यह है कि अगर आप स्वीडन का इतिहास देखे तो कुछ दशकों पूर्व स्वीडन में मुस्लिम समुदाय के लोगों की संख्या नगण्य थी लेकिन बाहरी लोगों (खासकर शरणार्थियों) को रहने देने की नीति आज स्वीडन पर भारी पड़ने लगी है। स्वीडन के निवासियों के अनुसार अब उन्हें जीने के लाले पड़े है

एक वक्त तक स्वीडन में इस तरह के प्रोटेस्ट चलाये जा रहे थे।

लोगों का विरोध जायज है:

लोग बदल रहे है नजरिया:

अब अगर इस बारे में गहन सोच रखी जाए तो कन्क्लूजन यह निकल कर आता है कि धर्म बेहद निजी चीज़ है और हमारी मान्यताओं में निहित है लेकिन अगर धर्म हिंसा फैलाने के लिए कारण बनता है तो यह चिंता का विषय है। धर्म को बेहद निजी मामलों तक सीमित रखना चाहिए हालांकि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि हमे सभी धर्मों का सम्मान करना सीखना चाहिए इसके साथ ही यह ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी धर्म मे हिंसा का कोई स्थान नहीं है। फिर भी धर्मो के इंटरप्रिटेशन में भारी गलतियां हुई है जिसका नुकसान दुनिया भुगत रही है।

स्वीडन में शरणार्थियों के लिए अजीब सा ऑफर करती हुई एमनेस्टी इंटरनेशनल की सदस्या (चित्र)

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