उदय बुलेटिन
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लोकसभा इलेक्शन 2019 : अपने दम पर बीजेपी बहुत मुश्किल से 200 के आंकड़े को छू पाएगी

चुनावी अंकगणित के आधार पर 2019 में एनडीए को रोक पाना संभव है. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या पूरा विपक्ष इसके लिए तैयार है? 

Suraj Jawar

Suraj Jawar

चुनावी भविष्यवाणी एक मजेदार खेल है. अलग-अलग अनुमान आते हैं और वनडे मैच की तरह रिक्वायर्ड रेट हमेशा बदलता रहता है. अटकलबाजी उस समय तक चलती रहती है, जब तक अंतिम नतीजों का एलान नहीं हो जाता. लोकसभा चुनाव की तारीख घोषित होने में अभी लगभग महीने भर का वक्त शेष है. लेकिन माहौल कुछ ऐसा बन चुका है, जैसे कल ही नतीजे आने वाले हों.

दो बड़े चुनावी सर्वे ने राजनीतिक बहस को और गर्मा दिया है. एबीपी न्यूज़ और इंडिया टुडे दोनों के सर्वे नतीजे लगभग एक जैसे हैं. इनका सार यह है कि अगर अभी चुनाव हुए तो एनडीए बहुमत से 30 से 40 सीटें दूर रह जाएगा. अपने दम पर बीजेपी बहुत मुश्किल से 200 के आंकड़े को छू पाएगी.

राजनीतिक विश्लेषक इस बात का अनुमान लगाने में जुट गए हैं कि अगर सर्वे के नतीजे अंतिम परिणाम में बदल गए तो क्या दोबारा एनडीए की सरकार बन पाएगी. दलील यह दी जा रही है कि अगर तीन क्षेत्रीय पार्टियां बीजेडी, वाईएसआर कांग्रेस और टीआरएस चुनाव नतीजों के बाद एनडीए के साथ आने को तैयार हो जाएं तो केंद्र में सरकार बन जाएगी. इन पार्टियों खासकर टीएसआर और वाईएसआर की असली लड़ाई बीजेपी नहीं बल्कि कांग्रेस से है. लेकिन अगर एनडीए को इन पार्टियों का साथ नहीं मिला तो वो दोबारा सत्ता में नहीं आ पाएगी.

एबीपी न्यूज़ और इंडिया टुडे के सर्वे को भूल जाएं तब भी एक बात बहुत साफ है. अगर विपक्ष तय कर ले तो 2019 में नरेंद्र मोदी का दोबारा प्रधानमंत्री बन पाना लगभग नामुमकिन है. यह वाक्य आपको चौंकाने वाला लग सकता है लेकिन शत-प्रतिशत प्रतिशत सच है. यह वाक्य 2019 में जितना सच है, उतना इतिहास के हर दौर में सच था. आइए इस बात को थोड़ा विस्तार से समझते हैं.

अंकगणित क्यों है मोदी के खिलाफ

हमें यह याद रखना चाहिए भारत की चुनावी राजनीति का एक खास पैटर्न है. यहां जीतने वाले दल या गठबंधन को जितने वोट मिलते हैं, वो बाकी पार्टियों को मिले वोट के मुकाबले हमेशा कम होते हैं. आजाद भारत के सबसे लोकप्रिय राजनेता पंडित जवाहर लाल नेहरू के वोटों का आंकड़ा भी कभी 45 प्रतिशत से आगे नहीं बढ़ पाता था. इसका मतलब यह हुआ कि लोकप्रियता के शिखर पर होने के बावजूद उस जमाने के आधे से ज्यादा मतदाता उन्हें वोट नहीं देते थे.

आजाद भारत के इतिहास में सिर्फ एक बार ऐसा हुआ है, जब किसी पार्टी को 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले हैं. 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पैदा हुई सहानुभूति लहर के दौरान जब राजीव गांधी ने 400 सीटों का आंकड़ा पार किया था, तब उन्हें लगभग 51 परसेंट वोट मिले थे. गरीबी हटाओ के नारे पर 1971 में प्रचंड बहुमत से जीतने वाली इंदिरा गांधी भी तब 43 प्रतिशत वोट ही हासिल कर पाई थीं.

नरेंद्र मोदी पिछले 30 साल के सबसे लोकप्रिय राजनेता हैं. लेकिन 2014 में उनके नेतृत्व में बीजेपी को सिर्फ 31 परसेंट वोट मिले थे. अगर एनडीए को मिले वोट जोड़ लें तब भी यह आंकड़ा 36 परसेंट के आसपास ही होगा. यानी जितने वोट से मोदी प्रधानमंत्री बने, उससे करीब दोगुना वोट बाकी पार्टियों को मिला. अगर बिखरे हुए उस वोट का एक बड़ा हिस्सा एकजुट हो गया तो नतीजा क्या होगा? मोदी यह बार-बार कहते हैं कि चौकीदार को रोकने के लिए सारे बेईमान इकट्ठा हो गए हैं. राजनीतिक नारेबाजी के तौर पर यह बात ठीक हो सकती है. लेकिन व्यवहारिक रूप में अब तक ऐसा नहीं है. अगर किसी भी प्रधानमंत्री के खिलाफ अगर सारे विरोधी दल इकट्ठा हो गए तो उसका दोबारा सत्ता में आना असंभव हो जाएगा. भारतीय राजनीति के इतिहास में ऐसे उदाहरण मौजूद हैं.

विपक्षी एकता सत्ता पक्ष पर हमेशा भारी पड़ती है

विपक्षी एकता का पहला और सबसे अभूतपूर्व उदाहरण 1977 का लोकसभा चुनाव था। इमरजेंसी की वजह से अलोकप्रिय होने के बावजूद इंदिरा गांधी राजनीतिक रूप से बहुत ताकतवर थीं। उनके करिश्माई व्यक्तित्व के मुकाबले खड़े होने लायक कोई चेहरा विरोधी दलों के पास नहीं था। लेकिन विपक्ष चमत्कारिक रूप से एकजुट हो गया।

अलग-अलग और परस्पर विरोधी विचारधारा वाली कई पार्टियों ने अपना विलय किया और जनता पार्टी अस्तित्व में आई. जनता पार्टी में दक्षिणपंथी जनसंघ के लोग थे, जेपी और लोहिया को विचारधारा से प्रभावित समाजवादी लोग थे और खुद को गांधीवादी बताने वाले बहुत से कांग्रेसी भी थे. इस एकजुटता का नतीजा यह हुआ कि इंदिरा गांधी बुरी तरह हार गईं और 30 साल में पहली बार कांग्रेस पार्टी केंद्र की सत्ता से बेदखल हुई.

दूसरा उदाहरण 1989 के लोकसभा के चुनाव का है. रिकॉर्ड तोड़ बहुमत से सत्ता में आनेवाले राजीव गांधी के चमकते करियर पर बोफोर्स का ग्रहण लग गया. विपक्ष ने इस मुद्दे को जोर-शोर से भुनाया. उस दौरान लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में राम-मंदिर का आंदोलन भी चल रहा था, जिसे बाकी विपक्ष सांप्रादायिक और विभाजनकारी मानता था.

लेकिन बीजेपी से गहरे वैचारिक मतभेद के बावजूद जनता दल ने उसके साथ चुनाव पूर्व समझौता किया. चुनाव नतीजों के बाद वी.पी सिंह को दक्षिणपंथी बीजेपी के साथ लेफ्ट पार्टियों ने भी समर्थन दिया, ताकि राजीव गांधी को सत्ता में आने से रोका जा सके.

यह दो उदाहरण साबित करने के लिए काफी हैं कि अगर पूरा विपक्ष तय कर ले तो ताकतवर से ताकतवर राजनेता को दोबारा सत्ता में आने से रोका जा सकता है. बीजेपी के पूर्व नेता और एंटी मोदी मुहिम में जोर-शोर से शामिल यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी लगातार विपक्ष को याद दिला रहे हैं कि उनके पास 69 परसेंट वोट हैं. हालांकि यह एक तरह का सरलीकरण भी है. तमाम गैर-बीजेपी वोट को बीजेपी या मोदी विरोधी वोट करार नहीं दिया जा सकता है.