क्या चुनाव पत्रकारिता चमकाने के त्योहार होते हैं? लक्षण तो कुछ ऐसे ही है, ये प्रैक्टिकल वाला माहौल है

चुनावी माहौल में पत्रकार बनने का सुनहरा मौका है, योग्यता का पैमाना सिर्फ चमचागीरी और एक यूट्यूब चैनल
क्या चुनाव पत्रकारिता चमकाने के त्योहार होते हैं? लक्षण तो कुछ ऐसे ही है, ये प्रैक्टिकल वाला माहौल है
journalism in india During ElectionGoogle Image

अगर आप पत्रकारिता की शुरुआत करने जा रहे है या फिर आपका पत्रकारिता का कोर्स अपनी आखिरी सांसे गिन रहा है तो चुनाव आयोग से मिन्नतें मांगे की वो देश प्रदेश में कहीं चुनाव उप चुनाव कराए काहे कि ये आपकी पत्रकारिता चमकाने को अच्छा मौका देता है, लाइम लाइट भी अच्छी मिलती है और आपके मन मंदिर में बसने वाली पार्टी के अंदरूनी प्रचार का अच्छा मौका भी मिल जाता है।

क्या है चुनावी पत्रकारिता:

देखिए सीधी सी बात है कि भारतीय चुनाव और पत्रकारिता दोनो लगभग-लगभग एक रूप से होते जा रहे है, आपको अगर हमारी बात अखर रही हो तो अभी का अभी टीवी का रिमोट उठाइये और देखिए न्यूज चैनल कैसे दो फाड़ होकर चुनाव प्रचार में लगे हैं, एक जो सत्ता पक्ष का गुणगान करते नहीं थक रहे होंगे और दूसरे जिन्हें सत्ता पक्ष का आज तक कोई काम जायज ही नहीं लगा, कभी शौचालय की शीट पर बैठकर बताएंगे कि सरकार ने जो शौचालय बनवाये है उनकी सिटिंग पोजिशन ठीक ही नहीं है, लोग तबियत से फ्रेश नहीं हो पाते, कुछ लोग तो ये भी बताने से नहीं चूकते की जब खाया ही नहीं तो शौचालय किस काम के? खैर हम रास्ता भटक चुके है, असल मुद्दा है नई नवेली पत्रकारिता...

दरअसल कोई भी नया पत्रकार शुरुआत में विद्रोही होता है, वो अपने आप को चौथा स्तंभ मानकर आगे बढ़ता है लेकिन जैसे ही उस सूखे चौथे खंभे को आर्थिक नमी का पोषण मिलता है वह बाग-बाग हो उठता है उसे एहसास होता है कि हमने जो सोचा था वो निरा गलत था, दरअसल यह वो पत्रकारिता है ही नहीं जिसे किताबों में पढ़ाया गया था।

धीरे-धीरे वही पत्रकारिता "तटस्थता को इतिहास कभी क्षमा नहीं करता" के सिद्धांत पर एक पक्ष अपनी सुविधानुसार ग्रहण करता है और दुकान चमकाने के प्रयास में लग जाता है, चूंकि पक्ष ग्रहण करने की वजह से उसके फॉलोअर और विपक्षी दोनों बनते है जिसका नुकसान न होकर फायदा होता चला जाता है। खासकर इंटरनेट की दुनिया और सोशल मीडिया इनके फैन पेज से भर जाती है और वास्तविक पत्रकारिता इनके आगे बेदम नजर आती है।

जरा इनपर भी नजर डाले:

पत्रकारिता कम मनोरंजन ज्यादा नजर आता है

बिहार में हर गली नुक्कड़ में पत्रकार घूम रहे हैं:

अगर आप ताजा माहौल देखे तो बिहार के हर गली नुक्कड़ में युट्यूबीए, पत्रकार ग़दर काटे है, हर आदमी के मुंह मे माइक घुसेड़ा जा रहा है साथ ही उस आदमी का इंटरव्यू लिया जा रहा है जो उनके मनमाफिक बयानबाजी करता नजर आ रहा है, वैसे उनका भी दोष नहीं है बयान देने वाला आदमी भी इसे अपने चमकने का अवसर मानकर शब्दों का निवेश करना शुरू कर देता है। पत्रकार चूल्हे चौके से लेकर शौचालय तक कि सिटकनी खोलते बंद करते हुए नजर आते है, लेकिन क्या सिर्फ इससे चुनाव का मुद्दा जायज रह पाता है? दरअसल असलियत तो यह है कि पत्रकारों द्वारा अपने फेवर के नेताओं से वही सवाल पूंछते हुए नजर आते है जिनको नेता जी ने उपलब्ध कराया है।

उदाहरण के तौर पर कुछ इंटरव्यू पर नजर डाली जा सकती है

ग्रह मंत्री अमित शाह का इंटरव्यू:

तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष का इंटरव्यू भी देख लीजिए:

लेकिन सबसे मारक वाकया ये है जब पुण्य प्रसून बाजपेयी जी अरविंद केजरीवाल से यह कहते हुए नजर आए की ये बात ज्यादा लोगों को हिट करेगी

खैर वक्त बदल रहा है, सोशल मीडिया ने लिखने और आवाज उठाने की चाहत रखने वाले मौकों को बढ़ाया है, लेकिन इसमे भी ढाक के तीन पात वाली कहानी नजर आ रही है, वही पुराने ढर्रे पर चलने वाली पत्रकारिता का अंजाम क्या होगा इसका तो भगवान जाने।

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उदय बुलेटिन
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