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अचार संहिता का अचार, अंतिम चरण का प्रचार

जैसे-जैसे चुनाव अपने अंतिम समय को जा रहे हैं वैसे ही अचार संहिता का अचार बास मारने लगा है

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

एक समय था जब अटल बिहारी बाजपाई जी के किस्से हमे बड़े आदर के साथ सुनाए जाते थे, चुनाव हारने पर विरोधी विजयी प्रत्याशी के घर जबरदस्ती मिठाई मांग कर खाना,चुनाव समय मे सत्तू लोटा लेकर क्षेत्र में निकलना ,बैलगाड़ी ,घोड़ागाड़ी से प्रचार-प्रसार करना,

लेकिन अब सब यह नही रहा,

हर दिन लोकतंत्र को आईसीयू में जबरदस्ती डाला जा रहा है, केंद्र अपनी हनक में है और राज्य के नखरे तो पूंछो ही मत,

आज नेताओ ने अपने पीछे भयानक चमचो की वह फ़ौज खड़ी कर रखी है जो अपने नेता के एक इशारे पर अपने परिवार की सारी सुध-बुध खोकर सर्वस्व बलिदान करने को तैयार है जो कि कही से भी लोकतंत्र और देश के लिए हितकर नही है।

तमाम वीडियो वायरल हो रहे है , कोई पूर्व सैनिक लेकिन वर्तमान दत्तक नेता(गोद लिया हुआ नेता) मोदी को मारने की सुपारी लेने के लिए तैयार है, तो कोई नेता शहीदों को कर्म का फल पाने वाला बता रहा है ,कोई सत्तारूढ़ मुख्यमंत्री अपने राज्य में देश की सबसे बड़ी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रोड शो में अपने गुर्गे भेजकर आतंक खड़ा कर देता है ,तो कोई मुख्यमंत्री अपने ही राज्य में आम आदमी से चांटे खाने के लिए प्रशिद्ध हुआ जाता है,

शराब चुनाव में गलूकोज की तरह प्रयोग की जाती है ,यह चमचो ओर गुर्गो में अपने नेता के प्रति लगातार काम करने लिए प्रोत्साहित करती है ओर यकीन मानिए तो शराब पीने के बाद ये चमचे अपने पिता जी जो कि दूसरे दल को मानते है उन्हें भी पैग दर पैग गरियाते मिलेंगे,

वैसे मेरे हिसाब से चुनाव की अलग प्रक्रिया होनी चाहिए , क्योकि चुनाव आयोग जो पैसो को पानी की तरह बहाने पर रोक लगाने का प्रयास करता है (लेकिन असलियत कुछ अलग है) इसको हटाकर चुनाव आयोग को टेंडर प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए ,क्योकि चुनावो में भी मतदाता को या तो वादों से खरीदा जाता है या फिर शराब और पैसे से, तो क्यो ना हर संसदीय क्षेत्र में वोटरों की बोली लगाई जाए ,जो ज्यादा मालदार होगा पांच साल वह सत्ता का सुख भोगे, क्योकि जीत जाने के बाद भी नेता कहाँ और किसकी सुनते है

आप वर्तमान समय मे किसी भी नेता जी को फोन लगाइये ,आपके फोन से रिंग भी नही जाएगी और नेता जी आपसे दूरस्थ दंडवत मिलेंगे, लेकिन चुनाव के बाद आप नेता जी को साक्षात दंडवत करिये उनका फोन भी नही मिलेगा, अब जब सारा खेल पैसा और पावर का है तो मतदाता को अपने वोट की असल कीमत पहचाननी होगी ,एक पौआ या 500 का नोट आपकी कीमत नही हो सकती,कुछ तो बड़ा सोचो क्योकि यही मौका है जो 5 साल में आपको मिला है और उसके बाद आपका ओर आपको दिए हुए वादों का क्या होगा चुनाव आयोग जाने ,भगवान तो तब भी नही जानेगा क्योकि जितनी छीछालेदर इन चुनावों में भगवान की होती है उतनी किसी की भी नही।