उदय बुलेटिन
www.udaybulletin.com
UP Loksabha Election 2019
UP Loksabha Election 2019|IANS
इलेक्शन बुलेटिन

गेस्ट हाउस कांड के 25 साल बाद मायावती-मुलायाम एक ही मंच पर, क्या PM बन पाएगी मायावती ?

1999 में वाजपेयी को पीएम की कुर्सी से गिराने वाली मायावती 2019 में पीएम बन पायेंगी ?

AKANKSHA MISHRA

AKANKSHA MISHRA

कहा गया है कि राजनीति में न कोई किसी का दोस्त होता है, और न दुश्मन। यह बात एक बार फिर चरितार्थ हुई है, जब सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव और बसपा प्रमुख मायावती ने एक साथ मंच साझा किया। दोनों नेता और उनके दल पहले भी एकसाथ काम कर चुके हैं। लेकिन दो जून, 1995 को लखनऊ में हुए गेस्ट हाउस कांड ने दोनों के बीच इतनी गहरी खाई खोद दी थी कि उसे पाटने में लगभग 25 साल लग गए। आज माया ने मुलायम को सहारा देकर मंच पर अपने बगल में बैठाया है।

मुलायम के लिए वोट

सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव मैनपुरी लोकसभा सीट से पार्टी के उम्मीदवार हैं और मायवती उनके लिए वोट मांगने आई हैं। दोनों नेता लगभग ढाई दशक बाद एकसाथ मंच साझा कर रहे हैं। इस चुनाव में सपा, बसपा, आरएलडी का गठबंधन है।

रैली में मायावती पहले ही मंच पर पहुंच चुकी थीं, और मुलायम बाद में पहुंचे। मुलायम जैसे ही मंच पर पहुंचे मायावती खड़ी हुई और उन्होंने आगे बढ़कर मुलायम को सहारा दिया। मुलायम मंच पर मायावती के बगल में बैठे। मंच की यह तस्वीर गठबंधन प्रतिद्वंद्वियों को संदेश देने के लिए पर्याप्त है कि दोनों दल भाजपा के खिलाफ एकजुट हैं।

मायावती का एहसान को कभी नहीं भुलेंगें मुलायम

मुलायम ने अपने संबोधन में कहा, "मायावती हमारे लिए वोट मांगने आईं हैं। हम उनका स्वागत करते हैं।" उन्होंने मायावती को संबोधित करते हुए कहा, "आपके इस एहसान को कभी नहीं भूलूंगा।" मुलायम ने रैली में मौजूद लोगों से कहा कि मायावती का बहुत सम्मान करना होगा, माया ने हमेशा हमारा साथ दिया है।

मायावती का दर्द

इसके जवाब में मायावती ने भी मुलायम सिंह के लिए जनता से वोट की अपील की। इस दौरान गेस्ट हाउस कांड का दर्द भी उनके भाषण में छलका। उन्होंने कहा, "न भूलने वाले कांड के बाद भी हम एकसाथ चुनाव लड़ रहे हैं।" साथ ही उन्होंने मुलायम सिंह को ही पिछड़ों का असली नेता बताया।

पीएम की कुर्सी

मायावती की दिली इच्क्षा रही है कि वो एक दिन प्रधानमंत्री बनें। उनके महागठबंधन के सहयोगी अखिलेश यादव भी कई बार मंच से कह चुके हैं कि मायावती जी की इस इच्क्षा को पूरी करने में वो अपना जी-जान लगा देगें। लेकिन इन सबके बीच सवाल यह उठता है कि क्या उत्तर प्रदेश की 38 सीटों से चुनाव लड़ कर कोई प्रधानमंत्री बन सकता है ?

वैसे तो मायावती ने हमेसा मुसीबतों का सामना किया ही, चुनौतियों के मुंह से सफलता खींची हैं। घर छोड़ा-परिवार छोड़ा ,विद्रोही बनी। लेकिन कभी हार नहीं मानी। मुलायम सिंह हो या कांशी राम किसी के सामने नहीं झुकीं। लेकिन लगातार तीन बार विधानसभा चुनाव हारने के बाद उनके प्रधानमंत्री बनने की महत्वकांक्षा पर धक्का जरूर लगा होगा। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वो प्रधानमंत्री नहीं बन सकती, उनका राजनीतिक करियर ख़त्म हो गया है।

भारतीय राजनीति के बड़े-बड़े इतिहासकार भी मानते हैं कि कोई भी राजनेता चाहे कितने बार भी चुनाव क्यों न हरा हो, उसके राजनीतिक भविष्य पर सवाल करना बेवकूफी है। कई बार ऐसी भी हुआ है कि जब राजनीतिक ज्ञानियों ने मान लिया हो कि लोगों ने इस नेता को दरकिनार कर दिया उसके बावजूद राजनेता ने कल्पनातीत ऊंचाइयों को छुवा है सफलता पाई है।