उदय बुलेटिन
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कहानी पहले लोकसभा चुनाव कि
कहानी पहले लोकसभा चुनाव कि|Google
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कहानी पहले लोकसभा चुनाव की, जब 4500 सीटों के लिए हुआ था मतदान 

चुनाव को लोकतंत्र का उत्सव माना जाता है, यानी जनता का उत्सव जो आमतौर पर हर पांच साल में आता है। आइये आज देश के पहले आम चुनाव पर चर्चा करते हैं। 

AKANKSHA MISHRA

AKANKSHA MISHRA

देश में आम चुनाव तो आजादी से पहले भी कई बार हुए थे, लेकिन तब धारा सभाओं यानी कि आज की विधानसभाओं का गठन नहीं हुआ था। आजादी के बाद देश में पहली बार मुकम्मल चुनाव 1952 में हुआ और तब केंद्र और राज्य सरकार का गठन हुआ । पहले चुनाव की कहानी आज के समय से काफी अलग थी। उस समय न तो EVM का चलन था न ही चुनाव आज की तरह आसान था। बड़े बड़े आकर की मतदान पेटियों पर उम्मीदवारों के नाम लिखे होते थे और चुनाव चिन्ह बने होते थे। आज की तरह न जनसंख्या का अनुमान था और न ही लोग चुनाव के प्रति जागरूक थे। चुनाव आयोग को पहले आम चुनाव में बड़ी मुश्किल उठानी पड़ी थी। लोगों को साल भर पहले से चुनाव के तरीके समझाए जा रहे थे।

पहले चुनाव का मतदान चिन्ह
पहले चुनाव का मतदान चिन्ह
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पहले चुनाव का मतदान चिन्ह

देश की आजादी के बाद पहली बार चुनाव हो रहा था। 26 जनवरी 1950 में संविधान को स्वीकार करने के बाद देश का पहला आम चुनाव किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था। इस चुनाव के मतदान चिन्ह भी अनोखे थे। चुनाव निशान के तौर पर बैलों की जोड़ी, झोपडी, हाथी, मिट्टी का दिया इस्तेमाल किया गया था। मतदाता अपना मतपत्र उम्मीदवारों के नाम से रखी गई पेटियों में डालते थे। चुनाव में दिक्कत न हो इसलिए दो लाख मतदान केंद्र में बीस लाख इस्पात की मतपेटियाँ बनाई गई थी। जिसे बनाने में आठ हज़ार दो सौ टन इस्पात लगा था। इन मतपेटियों को एक जगह से दूसरी जगह लेकर जाना भी बड़ा मुश्किल काम साबित हुआ।

चुनाव आयोग की 4500 सीटों पर मतदान कराने की तैयारी 
चुनाव आयोग की 4500 सीटों पर मतदान कराने की तैयारी 
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चुनाव आयोग की 4500 सीटों पर मतदान कराने की तैयारी

देश के पहले लोकतांत्रिक कवायद को समझने के लिए कुछ आंकड़ें ही काफी हैं। पहले आम चुनाव में 4500 सीटों के लिए चुनाव हुए थे। जिसमें संसद के लिए सिर्फ 500 और बाकी सीटें राज्यों की विधानसभाओं के लिए थीं। जिसके लिए दो लाख चौबीस हज़ार मतदान केंद्र बनाये गए थे। इन मतदान केंद्रों की सुरक्षा के लिए तीन लाख मतदान कर्मी और सवा दो लाख सुरक्षा कर्मी तैनात किये गए थे। इस चुनाव की तैयारी चुनाव आयोग ने करीब एक साल पहले ही शुरू कर दी थी।

कांग्रेस एक मात्र पार्टी बन कर उभरी
कांग्रेस एक मात्र पार्टी बन कर उभरी
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कांग्रेस एक मात्र पार्टी बन कर उभरी

देश के पहले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ही एक मुख्य भूमिका वाली पार्टी थी। क्योंकि उन दिनों कांग्रेस पार्टी ही एक मात्र पार्टी थी, इसलिए पूरा माहौल भी कांग्रेस के पक्ष में था। हालांकि 1951 में भारतीय जनसंघ का गठन तो हो चुका था लेकिन वो मुख्य धारा में नहीं आ सकी थी।

पहले लोकसभा चुनाव का परिणाम
पहले लोकसभा चुनाव का परिणाम
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पहले लोकसभा चुनाव का परिणाम

देश के पहले आमचुनाव में कांग्रेस आराम से जीत गई थी। पार्टी को संसद की 489 में से 364 सीटें मिली थी। पंडित जवाहर लाला नेहरू के जलवे के बाद भी पार्टी को देश में 45 फीसदी वोट ही मिले और कांग्रेस की इस जय जयकार वाले माहौल में कई दिग्गज नेता हार गए। पंडित जवाहर लाल नेहरू खुद सबसे ज्यादा मतों से चुनाव नहीं जीते। हारे हुए नेताओं में मोरारजी भाई देसाई, जयनारायण व्यास जैसे बड़े दिग्गज शामिल थे।

चुनाव के साथ बदल गई थी पत्रकारिता
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चुनाव के साथ बदल गई थी पत्रकारिता

आजादी से पहले जितने भी पत्रकार थे, वे पूरी तरह लड़ाई में लगे हुए थे। देश का पहला लोकसभा चुनाव देश की जनता के साथ-साथ पत्रकारों के लिए भी नया अनुभव था। आजादी तो पा ली थी लेकिन अब सवाल यह था कि इस आजाद भारत में अपना योगदान कैसे दें। आजादी के बाद जब पहली बार चुनाव हुआ तो पत्रकारों ने देखा, समझा और निष्पक्ष होकर रिपोर्टिंग की।