उदय बुलेटिन
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 Priyanka gandhi 
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इलेक्शन बुलेटिन

लोकसभा चुनाव 2019: शुरू हुई वोट बैंक की राजनीति, प्रियंका के चंद्र शेखर से मिलने के क्या है मायने यहां समझिए !

चंद्र शेखर से मिलना तो बहाना है दलित वोटरों को कांग्रेस के पाले में लाना है !

Anuj Kumar

Anuj Kumar

कहते है दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। लेकिन चुनाव में कब कौन किसका दुश्मन बन जाए और कब दोस्त कहा नहीं जा सकता। बुधवार को यूपी के मेरठ से एक बड़ी खबर आईं। दलित नेता चंद्र शेखर से मिलने के लिए प्रियंका गांधी अस्पताल पहुंची। ये मुलाकात लगभग आधे घंटे चली। चुनावी मौसम में एक दूसरे से मिलने के कई मायने होते है। लेकिन अब सवाल उठा है कि अचानक कांग्रेस को दलित नेता चंद्र शेखर की चिंता क्यों होने लगी।

दरअसल, कांग्रेस को चंद्र शेखर की चिंता नहीं है बल्कि उसके नाम के आगे लिखे शब्द 'दलित' की चिंता है। 2014 लोकसभा में महज 44 सीटों पर सिमटने वाली कांग्रेस, 2019 के आम चुनाव में किसी भी तरह बैकफुट पर नहीं खेलना चाहती। खास तौर पर यूपी में।

कांग्रेस ये उम्मीद में थी कि यूपी में बने महागठबंधन में उनकी भी हिस्सेदारी होगी। लेकिन महागठबंधन ने कांग्रेस को ठेंगा दिखा दिया। मायावती ने साफ कह दिया है कि वो किसी भी राज्य में कांग्रेस से गठबंधन नहीं करेंगी।

वोट बैंक की राजनीति

अब सवाल उठता है कि आखिर क्यों कांग्रेस यूपी में दलित नेता को अपने साथ करना चाहती है। इसके लिए जरा इन आंकड़ों को देखिए।

पूरे देश में ऐसी 80 सीट है जहां दलित का वर्चस्व बेहद मजबूत है। बीजेपी ने 2014 के चुनाव में इनमें से 41सीटों पर जीत दर्ज की थी। केवल यूपी में ही लगभग 21 फीसदी दलित है। ऐसे में इनका वोट बेहद अहम हो जाता है। मायावती दलित वोटरों के सहारे ही राज्य और केंद्र की राजनीति में अहम भूमिका निभाते आ रही हैं।

दरअसल, पिछले कुछ महीने से कांग्रेस ने मायावती को अपने साथ लाने की बहुत कोशिश की, लेकिन ऐसा हो न सका। अब कांग्रेस की नजर युवा दलित नेता चंद्र शेखर पर है। पश्चिमी यूपी में चंद्र शेखर की पकड़ बेहद मजबूत है। कांग्रेस इसके सहारे 2019 की नैया पार लगाना चाहती है। सहारनपुर, फतेहपुर सिकरी, मेरठ, कैराना ये ऐसे सीट है जहां दलितों की संख्या अधिक है। अगर कांग्रेस चंद्र शेखर को अपने पाले में लाने में कामयाब हो जाती है। तो इसका सीधा-सीधा नुकसान महागठबंधन को होगा।यही कारण रहा है कि प्रियंका और चंद्र शेखर की मुलाकात मायावती को रास नहीं आई।