उदय बुलेटिन
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लोकसभा चुनाव 2019: आखिर क्यों आरएलडी को तीन सीटों से संतुष्ट होना पड़ा ?

आरएलडी के सपा-बसपा के साथ आने से पश्चिमी यूपी में महागठबंधन की साख मजबूत होती दिख रही है।

Anuj Kumar

Anuj Kumar

कहते है दिल्ली की सत्ता का रास्ता यूपी से होकर जाता है। फिलहाल इस रास्तों पर सांप-सीढ़ी का खेल चल रहा है। कब कौन सांप बनकर किसको डस ले या फिर सीढ़ी बनकर साथ दे ये कोई नहीं जानता। ऐसी ही एक सीढ़ी यानी आरएलडी का साथ सपा बसपा को मिला है। 4 मार्च को यूपी के गलियारों से एक खबर आई। सपा बसपा गठबंधन को अब आरएलडी का हैडपंप मिल गया है। यानी अब आरएलडी 2019 लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा के साथ चुनाव लड़ेगी। 5 मार्च को इसकी अधिकारिक घोषणा भी हो गई। ये गठबंधन कांग्रेस के लिए बुरी खबर है, खबरों की माने तो कांग्रेस कहीं न कहीं आरएलडी को अपने साथ लाने की जद्दोजहद में लगी थी लेकिन ऐसा हो न सका।

दरअसल, 12 जनवरी को सपा बसपा के बीच जब सीटों का ऐलान हुआ उस वक्त ही सपा और बसपा ने चार सीट छोड़ दी थी। दो सीटे कांग्रेस के लिए अमेठी और रायबरेली और दो सीटे बागपत और मुजफ्फरनगर आरएलडी के लिए। लेकिन आरएलडी ने पहले 6 सीटों की मांग की फिर पांच पर आई और उसके बाद 4 सीट की मांग कर अड़ी थी। इसके लिए बकायदा अखिलेश यादव और आरएलडी उपाध्यक्ष जयंत सिंह के बीच कई दौर की बातचीत हुई। बसपा सुप्रीमों मायावती किसी भी कीमत पर आरएलडी को दो से ज्यादा सीट देना नहीं चाहती थी।

गौरतलब है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आरएलडी के वोट बैंक माने जाने वाले जाट और बीएसपी के वोट बैक माने जाने वाले जटावों के बीच बनती नहीं है। मायावती किसी भी कीमत पर बीएसपी के वोट बैंक जटावों को नाराज नहीं करना चाहती थी। यही कारण रहा कि आरएलडी की लाख कोशिशों के बाद भी मायावती ने उनसे मुलाकात नहीं की। और आरएलडी को सिर्फ 3 सीटों से संतुष्ट होना पड़ा।

फिलहाल आरएलडी को जो अतिरिक्त सीट दी गई है। वो मुजफ्फरनगर की है। माना जा रहा है कि कैराना सीट के बदले आरएलडी को मुजफ्फरनगर की सीट दी गई है। आरएलडी जिन तीन सीटों पर चुनाव लड़ेगी उसमें मथुरा, बागपत और मुजफ्फरनगर है। जंयत ने इस बात के साफ संकेत दिए है कि उनकी पत्नी चारू चौधरी लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ेगी। जयंत चौधरी ने कहा कि मथुरा से चुनाव लड़ने के लिए उनके पास प्रबल दावेदार है। जयंत चौधरी बागपत और उनके पिता मुजफ्फरनगर से चुनाव लड़ेगे।

ये चुनाव का खेल है जहां आप अपने साथ अपने बेटे, पत्नी, चाचा, ताऊ सभी को टिकट देते हैं। हमारे देश में चुनाव में टिकट काम में काबिलियत के हिसाब से नहीं मिलता बल्कि परिवार की काबिलियत के हिसाब से मिलता है।