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इलेक्शन बुलेटिन

लोकसभा चुनाव 2019: शिवसेना और बीजेपी का साथ आना मजबूरी या मजबूती !

कहते हैं सुबह का भूला अगर शाम को घर आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते। इन दिनों शिवसेना के साथ भी कुछ यूं ही हुआ।

लगातार केंद्र और राज्य की सरकार के खिलाफ बयानबाजी के बावजूद आज शिवसेना अगामी लोकसभा चुनाव में बीजेपी के साथ खड़ी है। बीजेपी और शिवसेना के बीच ये गठबंधन मजबूरी है या मजबूती है ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन फिलहाल दोनों पार्टियों के बीच आम चुनाव में सीटों को लेकर समझौता हो गई। महाराष्ट्र में लोकसभा की कुल 48 सीटें है जिसमें से 25 पर बीजेपी लड़ेगी, तो वहीं 23 पर शिवसेना। इस बात की घोषणा सोमवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेस के जरिए की गई।

बीजेपी और शिवसेना के बीच ये गठबंधन इतना आसान नहीं था। इस गठबंधन को बनाए रखने के लिए बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने कई बार मुंबई का दौरा किया। इस दौरा कई मुद्दों पर शिवसेना के साथ समझौता भी करनी पड़ी। बीजेपी ने 2014 लोकसभा चुनाव में 26 सीटों पर चुनाव लड़ा था। वहीं इस बार 25 सीटों पर चुनाव लडेंगी। शिवसेना को एक सीट का फायदा हुआ। जहां 2014 में शिवसेना 22 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। इस बार 23 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। विधानसभा चुनाव की बात करे तो दोनों पार्टियां बराबर-बराबर सीटों पर चुनाव लड़ेंगी।

क्या था बीजेपी और शिवसेना के बीच सीट फॉर्मूला

जनता दल से अलग होकर बीजेपी ने अपनी पारी की शुरुआत 1980 में की। उस वक्त के चुनाव में बीजेपी को केवल 2 सीट ही मिली। लेकिन बीजेपी ने लगातार संगठन और एक विचारधारा वाली पार्टियों को जोड़ने की कोशिश की। शिवसेना के साथ बीजेपी का गठबंधन 1989 में हुआ। उस वक्त शिवसेना की बागडोर बाल ठाकरे के हाथों थीं। 1995 के विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी और शिवसेना के बीज एक समझौता हुआ था। समझौते के मुताबिक लोकसभा चुनाव में बीजेपी बड़े भाई की भूमिका में होगी। लोकसभा की 48 सीटों में बीजेपी 25 सीट पर चुनाव लड़ेंगी और शिवसेना 23 सीटों पर। लेकिन विधानसभा चुनाव में शिवसेना बड़े भाई की भूमिका में होगी। 288 सीटों वाली विधानसभा में शिवसेना 150 सीटों पर चुनाव लड़ेंगी। इसके साथ मुख्यमंत्री की सीट भी शिवसेना के पास रहेंगी। 1995 के बाद से महाराष्ट्र में बीजेपी और शिवसेना के बीच ये ही फॉर्मूला चलता आया है।

2014 में बीजेपी ने 26-22 के फॉर्मूले के तरह लोकसभा चुनाव में उतरी। मोदी लहर में बीजेपी को फायदा भी हुआ। इसके बाद विधानसभा चुनाव में बीजेपी और शिवसेना के बीच सीटों को लेकर कई बैठक हुई। लेकिन 1995 के सीट फॉर्मूले पर समझौता नहीं हुई। बीजेपी और शिवसेना अलग अलग चुनाव लड़ी। जहां बीजेपी को फायदा हुआ।

क्यों बीजेपी ने किया समझौता

दरअसल, लोकसभा सीटों की बात करे तो उत्तर प्रदेश के बाद सबसे ज्यादा सीट महाराष्ट्र में ही है। ऐसे बड़े राज्यों में सहयोगी पार्टी के अलग हो जाने से बीजेपी को नुकसान होगा। हाल ही में आई ओपिनियन पोल में भी बीजेपी को पूर्ण बहुमत मिलता नहीं दिख रहा है। ऐसे में पुराने सहयोगियों को साथ जोड़ना बीजेपी के लिए बेहद जरूरी है।