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आर्टिकल 15 फ़िल्म पर बवाल, निर्माता ने संगठनों को लिखा ओपन लेटर

अनुभव सिन्हा का ब्राम्हणों और करनी सेना को पत्र

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

जिस दिन से आर्टिकल 15 का ट्रेलर यू ट्यूब पर रिलीज हुआ ,उसी दिन से बखेड़ा खड़ा हुआ पड़ा है। फ़िल्म के निर्माता ,निर्देशक, सह लेखक इन दिनों भयानक मुसीबत में हैं। दरअसल 28 जून को आयुष्मान खुराना अभिनीत फिल्म आर्टिकल 15 रिलीज होने वाली है। यह फ़िल्म उत्तर प्रदेश के बंदायू जिले की एक घटना से प्रेरित है। पहले इसका नाम बंदायू रखे जाने की बात भी सुनी हुई थी, लेकिन इस वजह से फ़िल्म केवल एक जगह पर केंद्रित हो जाती। अतः इसका नाम भारतीय संविधान में आर्टिकल 15 पर रख दिया जो कि समानता के अधिकार की पैरवी करता है।

आखिर समस्या क्या है:-

ट्रेलर देखने से लगता है कि फ़िल्म बेहद मजबूत प्लेटफार्म पर बनाई गई है, सच्ची घटना को रोमांचक तरीके से प्रस्तुत किया गया है। लेकिन असल अड़ंगा यहीं पैदा हुआ है। ब्राम्हण महासभा और करणी सेना का आरोप है कि इस फ़िल्म के द्वारा ब्राम्हणों को निशाना बनाया जा रहा है। दरअसल इस फ़िल्म में आयुष्मान खुराना ( कांड के जांच /पुलिस अधिकारी) जो जाति व्यवस्था से परे हैं। लेकिन जब दो निचली जाति की दो बहनों को मार कर पेड़ में टांग दिया जाता है, तब कहानी ब्राम्हण सामंती व्यवस्था पर प्रहार करती है।

करनी सेना और ब्राम्हण महासभा इतनी मजबूती के साथ मुखर क्यों है ?

दरअसल ब्राम्हण महासभा और करणी सेना इसलिए भी मुखर है क्योंकि इस फ़िल्म में जिस विलेन के पात्र का चित्रण किया गया है वह किसी मठ के पुजारी का पुत्र दिखाया गया है, जो बिगड़ैल है। जो जातिवादी डायलाग बोलता है। साथ ही स्थानीय पुलिसकर्मी भी इसी तरह की बात करते नजर आते हैं। इस फ़िल्म में एक पक्ष को नीले झंडे और दूसरे को भगवा झंडे के साथ दिखाया गया है। जबकि बदायूं की असल घटना में किसी ब्राम्हण का नाम आया ही नहीं है। उस घटना के आरोपी किसी अन्य जाति से थे। ब्राम्हण महासभा के अनुसार ,ब्राम्हणों को जातिवादी दिखा कर सिर्फ नीचा दिखाने का काम किया गया है। और बकौल ब्राम्हण महासभा और करणी सेना हम यह फ़िल्म किसी भी थियेटर खासकर उत्तर प्रदेश में नहीं चलने देंगे।

अनुभव सिन्हा उवाच

अनुभव सिन्हा जो कि इस फ़िल्म के निर्माता निर्देशक और लेखक भी हैं। उन्होंने ट्विटर पर एक ओपन लेटर डालकर अपना पक्ष रखा है। जिसमें किसी जाति समुदाय, और समूह विशेष को ठेस न पहुंचाने की बात कही गयी है।

बहती गंगा में इन्होंने भी हाँथ धो लिए

पायल रोहतगी नाम तो सुना ही होगा। आजकल इनका काम कुछ खास चल नहीं रहा। इसलिए मौके बे मौके कुछ न कुछ बोलती रहती हैं।इस मौके की नजाकत को देखते हुए उन्होंने ट्वीट कर डाला जिसमें एक घटना का उदाहरण देते हुए ऊपर वाले से यह भी दुआ मांगी की यह फ़िल्म फ्लॉप हो।

खैर फ़िल्म ही तो है। लेकिन कुछ लोगों का यह भी तर्क है कि फ़िल्म समाज का आईना होती है। अपने-अपने तर्क है और अपनी-अपनी मजबूरी। वहीं ब्राम्हण महासभा इस बात पर कोर्ट जाने की तैयारी में है। वो अपनी पूरी ताकत के साथ इस फ़िल्म को रोकने में लगी है।

हालांकि यह भी सच है कि जिस घटना का रिफरेंस लेकर इस फ़िल्म को बनाया गया था उस घटना में उस तरह का ब्राम्हण टच था ही नहीं। जबकि इस घटना में ओबीसी समुदाय के कुछ लोगों की संलिप्तता पायी गयी थी।

निर्माताओं को अगर किसी सत्य घटना पर फ़िल्म बनानी हो तो तथ्यों को देखकर फ़िल्म बनानी चाहिए। अन्यथा रायता फैलना लाजिमी है। और एक बात और बतानी थी कि इसी विरोध के चलते फ़िल्म का भयानक प्रचार भी चालू है।