उदय बुलेटिन
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History of Arya Samaj
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सदियों का मिथक टूटा, आर्य मूल निवासी ही थे कहीं बाहर से नही आये थे ! 

ये है आर्य समाज की कहानी।

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

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आपने तमाम नारे और तमाम लेखकों की सैकड़ो किताबे पढ़ी होंगी जिंनमे आर्यो के भारत आने को “आर्यो के आक्रमण” जैसी घटना से प्रतिपादित किया होगा, लेकिन अब यह मिथक टूट चुका है, आर्यो को विदेशी कहने वाली टेक्स्ट बुकों और तमाम अन्य स्थानों पर लिखे गए इतिहास को बदलने की बारी है”

हमने जबसे पढ़ने की लालसा जगाई, तब से हमे हमेशा यही पढ़ाया गया है कि आर्य भारत के मूलनिवासी हैं ही नही, वो तो कही सुदूर यूरेशिया और अन्य जगहों से आकर भारत मे लूटमार किये और यही बस गए , लेकिन अब एक पुख्ता रिसर्च ने इस सदी के सबसे बड़े मिथक को तार-तार करके रख दिया है,
सबसे बड़ा सवाल तो इतिहास और पुस्तको में लिखे गए अनर्गल संदर्भो के मिटाने और बदलने का है,
हालकि इससे पहले भी भारतीय वैदिक प्रणाली आर्यो के मूलस्थान को आर्यावर्त, जम्बूद्वीप और अन्य नामो से परिभाषित करती रही है ,लेकिन समय-समय पर आने वाले इतिहासकार ,जेनेटिक्स स्टडीज वाले विद्वानों ने अपनी-अपनी सुविधानुसार तथ्यों को रखा और इतिहास के मूल से लोगों को वंचित रखा, हालांकि एक रिसर्च में मामला अब बिल्कुल आईने की तरह साफ हो चुका है,

अभी हाल में ही हरियाणा के एक गांव राखीगढ़ी में पुरातात्विक अनुसंधान के समय प्राप्त नरकंकालों के डीएनए टेस्ट में चौकाने वाले नतीजे आये है, प्राप्त कंकालों के पास ऐसी सामग्री उपलब्ध हुई है, जिस से पूरी तरह यह सिद्ध होता है कि हड़प्पा संस्कृति की स्थापना किसी बाहरी व्यक्ति ने नही बल्कि भारत के मूलनिवासी आर्यो ने  ही की थी, जिन्हें वैदिक भी कहा जाता रहा है
राखीगढ़ी में मिले कंकालों की डीएनए रिपोर्ट पूर्व में आई आर्यो की डीएनए रिपोर्ट्स से बिल्कुल इतर है, यहाँ मिले कंकालों के पास हवन सामग्री, यज्ञ वेदी, और सरस्वती उपासना पूजा के साक्ष्य न सिर्फ उन्हें मूलनिवासी परिभाषित करते है बल्कि पूर्व में जारी की गई रिपोर्ट्स को भी झुठलाते है,

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कृषि भारत मे आर्यो ने ही प्रारंभ की:

पूर्व में विद्वानों ने जो कहानियां रची थी जिंनमे कृषि को इराक और ईरान होकर भारत आने की बात कही गयी है, इसी अध्ययन में यह साबित हुआ है कि करीब 9000 साल पहले भारत मे आर्यन्स ने ही कृषि को करना प्रारंभ किया , कालांतर में यह पद्यति भारत से इराक, ईरान होते हुए पूरी दुनिया मे गयी

होता था हवन, सरस्वती देवी का था अहम स्थान,प्रेम करने में भी आगे थे आर्य:

पाए गए कंकालों के अध्ययन के बाद यह सिद्ध हुआ है कि आर्य पूजा पाठ में ज्यादा रुचि लेते थे, जैसा कि ऋग्वेद में वर्णित है, और ऋग्वेद के अनुसार सरस्वती उस समय की प्रमुख देवी थी, इन नरकंकालों के पास इससे जुड़े हुए पुख्ता साक्ष्य उपलब्ध हुए है,
आर्य प्रेम के भी हिमायती थे, एक कब्र की खुदाई के दौरान पति-पत्नी के साथ मे दफनाए जाने की बिनाह पर ऐसा कहा गया है, और शोध से यह भी पता चला है कि मरने वाले व्यक्ति की प्रेमिका विधवा थी

रिसर्च में विदेशी भी शामिल:

इस रिसर्च में भारतीय विद्वानों के अलावा विश्व की प्रमुख यूनिवर्सिटी हार्वर्ड के प्रवक्ता भी शामिल थे , इस खोज की शुरुआत (2011-2012) में ही हो गयी थी, और इस पर एक जर्नल भी प्रकाशित किया गया है जिसको दुनियाभर के विद्वानों द्वारा न सिर्फ स्वीकार किया गया है बल्कि सही तथ्य रखने के लिए सराहा गया है