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नानाजी देशमुख के साथ पूर्व राष्ट्रपति ए पी जे अब्दुल कलाम
नानाजी देशमुख के साथ पूर्व राष्ट्रपति ए पी जे अब्दुल कलाम|Social Media
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नानाजी देशमुख: भारत रत्न

सरस्वती शिशु मंदिर और विद्या भारती नानाजी देशमुख की देन है।  

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

महाराष्ट्र में सबसे छोटे भाई को नाना कहा जाता है, लेकिन उत्तर भारत का चित्रकूट जिला (पूर्व में बाँदा जिला) जहाँ नाना जी देशमुख का अंतिम कर्मस्थल रहा है, वहां नाना, माँ के पिता को कहा जाता है, दोनों ही पदों में स्नेह का अंबार है, दोनों वात्सल्यमयी होते हैं। एक जो सबसे छोटे होने के कारण सबका स्नेह पाता है, और दूसरा सबको स्नेह बांटता है।

अब भारत सरकार ने नानाजी देशमुख को मरणोपरांत भारत रत्न प्रदान किया है, दो महान व्यक्ति और हैं, भारत के पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी और दूसरे भूपेन हजारिका, दोनों ही भारत की महान विभूतियां हैं। दोनों ने अपने क्षेत्र में सराहनीय कार्य किये, जिसने समाज को अच्छी दशा और दिशा दी है, लेकिन आज मैं उस महान व्यक्तित्व की चर्चा करना पसंद करूंगा जिनका नाम नाना जी देशमुख है ,कारण क्या है?

Watch LIVE as President Kovind presents Bharat Ratna to Shri Pranab Mukherjee, Shri Nanaji Deshmukh (posthumously) and Dr Bhupen Hazarika (posthumously) at Rashtrapati Bhavan

Posted by President of India on Thursday, August 8, 2019

कारण अनेक हैं, लेकिन मुख्य दो है। प्रथम, मैं भी उसी क्षेत्र से हूँ जहाँ के उजड्ड क्षेत्र "उजड्ड शब्द का मतलब आपको ग्रामर में नहीं लोक भाषा मे मिलेगा,मतलब अधिकतर अशिक्षित, खूँखार मानसिकता वाले क्षेत्र जहाँ सिर्फ एक ही उद्देश्य है कि कैसे सिर्फ अपना भला हो जाये, इसके बारे में तो गोस्वामी तुलसी दास जी भी बराबर लिख कर गए हैं, कि जब भगवान राम चित्रकूट आये तो वहां के निवासी भीलों ने कहा कि हे प्रभु हमारे द्वारा आपकी सबसे बड़ी यही सेवा है कि हम आपका कपड़ा लत्ता नहीं छीन रहे है। (नाथ हमार यही सेवकाई, लेहि न भूषण बसन चुराई) हालांकि सभी ऐसे नहीं है और अब तो शायद है भी नहीं सब शिक्षित हो गए है। यदा कदा कभी कोई घटना अपवाद बन जाती है।"

सो अब हम पथ से विमुख होते जा रहे है विषय है नाना जी के ऊपर लिखने का , तो नाना देशमुख साहब ने अपना अंतिम कर्मस्थल चित्रकूट को चुना, क्यों ?

कारण तो ठीक से ज्ञात नहीं लेकिन कहते है वो संघ के दिनों से यहाँ आया करते थे और चूंकि गोरखपुर में उनका एक लंबा समय बीता वही से उन्होंने रामचरितमानस का विशेष अध्ययन किया और उसी महान कृति से उन्हें इस स्थान विशेष का लगाव हुआ, वैसे जब वो चित्रकूट आये तो वहां वैसा कुछ था नहीं , जंगल थे बीहड़ थे , दस्यु गिरोह अपने चरम पर थे , फिर भी उन्होंने उस स्थान को चुना जहां उन्हें अपना निजी सूत्र जो गांधी जी के विचारों से पल्लवित था "ग्रामोदय से राष्ट्रोदय"

Nanaji Deshmukh
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चलिए जीवन चरित्र को संक्षिप्त में जानते है

महाराष्ट्र का हिंगोली जिला जिसमें एक गांव है कडोली, वही अमृतराव और राजाबाई की पांच संतानों में से एक थे नाना जी देशमुख , माता पिता नाना जी को अल्पायु में ही छोड़कर दूसरे लोक को चले गए। इसके बाद से घर की स्थिति बेहद खस्ता हो चली थी। भोजन का प्रबंध भी बड़ी मुश्किल से हो पाता था , लेकिन संघ की शाखा में जाने की आदत थी, देशप्रेम की बाते करते तो रोंगटे खड़े हो जाते, किसी भी काम को बड़े प्रबंधन से करते, संघ में जाते समय ही संघ के उस समय के संस्थापक डॉ हेडगेवार जी से मुलाकात हुई, नाना साहब उस समय नौंवी कक्षा में थे , मतलब की किशोरावस्था।

संघ संस्थापक नाना जी के कार्यकुशलता से बड़े प्रशन्न थे और जब उन्हें नाना जी के घर की स्थिति मालूम हुई तो उन्हें यह सलाह दी कि वो पिलानी जाए और वहीं अपनी शिक्षा पूरी करें। नाना जी पहले तो थोड़ा सकुचे , लेकिन फिर जाने को पूरी तरह तैयार हो गये, लेकिन असल समस्या थी अर्थ की, पैसे की, जब यह बात डाक्टर साहब को ज्ञात हुई तो कुछ पैसे देने की पेशकश भी की, लेकिन स्वाभिमानी नाना जी ने पैसा लेने से विनम्रता पूर्वक मना कर दिया, आखिर हेडगेवार जी ने उन्हें कहा कि देखो जो भी करो लेकिन शिक्षा बंद मत करना।

इस तरह संभाली संघ की बागडोर

नाना जी किसी भी तरह से पिलानी जाने का निश्चिय कर चुके थे। हर प्रकार की मेहनत मजदूरी करके डेढ़ साल के अंत तक इतना पैसा जुटा कि नानाजी पिलानी जाकर शिक्षा ले सके , और सन 1937 में पिलानी जाने का अवसर मिला। और यही से आरंभ हुआ संघ का सफर जो राजनीति के साथ-साथ निजी जीवन से मृत्यु पर्यन्त तक चला। हालांकि जब उन्होंने राजनीति को अलविदा कहा फिर उसकी तरफ मुँह उठाकर नहीं देखा, बिल्कुल अटल जी की तरह या कहे अटल जी ने बिल्कुल उनकी तरह।

सन 1940 का साल, नागपुर में संघ के शिक्षा वर्ग का प्रथम वर्ष पूरा हुआ और इसी वर्ष डाक्टर हेडगेवार जी का देहावसान हो गया, और बाबा साहब आप्टे के निर्देशानुसार उन्हें आगरा में संघ का कामकाज देखने के लिए नियुक्त किया गया।

संघ में जीवन समर्पित कर दिया

एक बार जब संघ पर प्रतिबंध लगा और संघ के प्रतिबंध हटने पर उन्हें उत्तर प्रदेश में संघ को पुनर्जीवित करने पुष्पपल्लवित करने का अवसर मिला , चुकी नाना जी जमीन के जुड़े हुए व्यक्ति थे लोगों की आत्मा में चोट करने का माद्दा रखते थे। सौ लोगों पर पकड़ बराबर थी, और इसी तकनीकी के चलते उन्होंने सन 1957 के आखिर तक उत्तर प्रदेश के लगभग प्रत्येक जिले में संघ की इकाइयों को नए सिरे से न सिर्फ खड़ा किया बल्कि उन्हें मजबूत बनाया, इसी के साथ साथ नाना जी को एक और सामाजिक ज्ञान हुआ कि अगर देश के भविष्य को आक्रांताओं के द्वारा फैलाई गई विनाशक नीति से बचाना है तो सबसे पहले देश के नौनिहालों के भविष्य को बचाना होगा , और बच्चों के जीवन को सूंदर बनाने का एक ही मार्ग है शिक्षा।

सरस्वती शिशु मंदिर के प्रथम विश्वकर्मा

सन 1952 का साल, संघ की अन्तर प्रेरणा से नाना जी ने गोरखपुर के पक्की बाग नाम की जगह में पाँच रुपये मासिक किराये की जगह में एक विद्यालय का शुभारंभ किया , नाम रखा गया "सरस्वती शिशु मंदिर" और भारतीय संस्कार, देश मूल्य, देशप्रेम युक्त शिक्षा देने का पावन कार्य प्रारंभ हुआ। देखते ही देखते इन विद्यालयों को उत्तर प्रदेश में हर जिले में ही नहीं, कस्बों, गांवों और यहाँ तक कि मुहल्लों में भी खोला जाने लगा , विद्यालयों के मानक नियंत्रण, प्रबंधन के लिए समिति की आवश्यकता हुई तो सन 1958 में " शिशु शिक्षा प्रबन्ध समिति" के नाम से समिति का गठन किया गया, और नाना जी देशमुख इसके सदैव मार्गदर्शक बने रहे

कालांतर में यही समिति विद्या भारती के नाम से जानी गयी और फिर विद्या भारती ने सरस्वती विद्या मंदिर के नाम से देश भर में विद्यालयों को प्रारंभ कराया। जो कि मुख्यतः कक्षा नवमी से लेकर द्वादश (9 से 12) तक शिक्षा देते है, हालांकि सरस्वती शिशु मंदिर अभी भी बराबर मात्रा में चल रहे है, वर्तमान में विद्याभारती भारत का सबसे बड़ा गैर सरकारी संगठन है और इसके द्वारा कई नामों से लगभग 23320 शिक्षण संस्थान संचालित किए जा रहे है, लगभग 34 लाख से ज्यादा छात्र छात्राएं आज इनसे लाभान्वित है। केवल लक्ष्यद्वीप और मिजोरम को छोड़कर संपूर्ण भारत मे इनकी शाखायें उपलब्ध है, यह सब नाना जी देशमुख की ही देन थी।

राजनीति

आज राजनीति पर चर्चा करना जायज नहीं होगा, क्योंकि उनके धुर विरोधी भी उनका गजब का सम्मान करते थे चाहे वह चंद्रभानु गुप्त हो ( जो नाना जी के दावपेच के कई बार चुनाव हारे) या फिर भारत मे समाजवाद संरक्षक डाक्टर राम मनोहर लोहिया, सब की विचारधारा का बराबर सम्मान करना ,ऐसे थे नाना जी देशमुख।

"चित्रकूट में रमि रहे रहिमन अवध नरेश, जा पर विपदा परत है सो आवत यहि देश"

नाना जी पता नहीं किस सन्दर्भ में रामचरित मानस की इस चौपाई का उल्लेख करते थे, पता नहीं, लेकिन कुछ तो था, एक मिशन एक उद्देश्य देश के ग्राम को ऊपर उठाना है, मजबूत बनाना है।

1989 का साल नाना जी का चित्रकूट आगमन हुआ। पावन मंदाकिनी नदी के तट पर खुद को समझा , महसूस किया और गौर किया कि अब आगे क्या होगा, और कैसे होगा ?

फिर विचार आया कि मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम वनवास के समय यही आये और ग्यारह वर्षो तक रुके आखिर क्यों ? क्योंकि राम सबसे पहले लोक नायक है, उन्होंने कतार के सबसे आखिरी व्यक्ति तक पहुंचने की कोशिश की, कोशिश क्या मिले भी ह्रदय से लगाया भी।

विचार आया मैं क्यों नहीं रहता यही, क्योंकि राजा राम से भी कही ज्यादा पावन वनवासी राम लगते हैं, और ऐसा हुआ भी, निश्चय किया कि चित्रकूट बदलेगा और बदला भी, शिक्षा का कीर्तिमान स्थापित हुए , विश्व मे रैंकिंग वाला विश्वविद्यालय खड़ा किया "ग्रामोदय विश्वविद्यालय" समाज मे चेतना जगाई, अधिकारों के प्रति सचेत किया , स्वास्थ के साधन उपलब्ध कराने में मदद की, और हर वो कदम उठाया जो इस क्षेत्र को ऊंचाई पर ले जा सकता था।

देश के युवक-युवतियों से आवाहन

एक समय आया जब नाना जी को लगा कि इतना बड़ा कार्य सिर्फ उनके कार्यों से नहीं हो सकता, ग्रामीण और क्षेत्रवासियों में उनके कार्यों के प्रति कोई खासी रुचि भी नहीं थी। नाना जी ने देश के युवक युवतियों ( विवाहित पति पत्नी जिनकी उम्र 35 से कम हो, दो से ज्यादा जीवित पुत्र या पुत्री न हो, और कम से कम स्नातक हो) को ग्राम्य जीवन में सेवा करने का आवाह्न किया, देखते ही देखते देश के नवविवाहित दंपति चित्रकूट दौड़े चले आये, वो इन्हें समाज शिल्पी दंपति पुकारा करते थे, दंपतियों को लगभग तीन पखवारे का प्रशिक्षण मिलता और उन्हें ग्राम्य जीवन को बेहतर कैसे बनाया जाए वो समझाया जाता और पढ़े लिखे दम्पत्ति लग जाते पहाड़ों पर चढ़ने उतरने।

स्थानीय लोगों को बड़ा कौतूहल होता कि ये नए-नए लड़का लड़की आखिर पहाड़ों, जंगलों, और गांवों की खाक क्यों छान रहे है ?

लेकिन जैसे ही ग्रामीणों से आत्ममिलन हुआ , विचार साझा हुए वो ग्रामीणों के लिए संजीवनी हो गए। और फिर चाहे पहाड़ काट कर रास्ता बनाना हो , या छोटे मोटे पुल बनाना हो सब हुआ नाना जी के निर्देशन में।

निधन भी व्यर्थ नहीं

कहते हैं शरीर नाशवान है लेकिन नाना जी देशमुख ने इसे भी समाज के लिए अमर किया , मृत्यु के काफी पहले सन 1997 में वो भारत के प्रथम ऐसे व्यक्ति बने जिन्होंने वसीयत नामा लिखकर अपने शरीर का देहदान एम्स (दिल्ली) को किया ताकि विद्यार्थी मानव शरीर की संरचना देख कर समाज को निरोगी बना सके, और यह भी बताया कि मैं सदैव घुमक्कड़ रहा हूँ मरते समय कहाँ रहूं पता नहीं, इसलिए ये 11,000 रुपये मृत शरीर को दिल्ली तक पहुंचाने में काफी होंगे।

27 फरवरी 2010 के दिन नाना जी देशमुख अपनी कर्मभूमि चित्रकूट में ही इस देह को त्याग गए। दिनांक 8 अगस्त 2019 को भारत सरकार ने उन्हें समाज और देश के लिए किए गए कार्यों को देखते हुए भारत के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया है।