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Sakshi Mishra with her Father Rajesh Mishra
Sakshi Mishra with her Father Rajesh Mishra|Google Images
ब्लॉग

समाज की नई सोच, अगर बेटी घर से भागी तो मासूम, और बाप दुश्मन !

प्रेम विवाह के पीछे की असल विरोधी ताकत, सामाजिक शर्मिंदगी और ताने

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

Summary

मैंने अभी पारले जी बिस्किट खाया, पारले जी से याद आया कि अब दुनिया पारले जी खाने वाली नही उसकी जगह कुकीज, बोर्बोन (Bourbon biscuit) जैसी महंगी बिस्किट समुदायों ने हड़प ली है, इसीलिए आपकी नजर में हम जैसे लोग प्रीमेटिव श्रेणी में गिने जा सकते है, गिन लीजिये आपकी गिनती और आपका दिमाग, बिस्किट की क्लास से याद आया कि बरेली की एक घटना ने समाज को क्लास में बांट कर रख दिया है !

चार दिन से बरेली जिले के विधायक और पप्पू भरतौल नाम से जाने वाले नेता जी की बेटी किसी अन्य विधायक के भांजे के साथ भाग गई, मामला अंतरजातीय था,विरोध होना निश्चित था, लोग लामबंद होंगे, गुट बाजी होगी, लोग अपना अपना पक्ष पकड़ लेंगे कोई साक्षी को साहसिक कदम उठाने वाली लड़की करार देंगे,और कोई विधायक को बेबस पिता..........

हालांकि साक्षी बालिग है, संविधान और कानून के हिसाब से वह अपनी मर्जी के अनुसार जीवनसाथी चुन सकती है, वो अपनी मर्जी जिसमे सहमति शामिल होती है उसके अनुसार तलाक ले सकती है, ब्ला ब्ला ब्ला........

अच्छा अब प्रेम विवाह  का गणनात्मक अध्ययन करते है, एन.सी.आर (NCR) के एक महिला थाने के आंकड़ो के अनुसार परिवार परामर्श केंद्र पर एक साल में 860 मामले विवाद के आये जिसमे दम्पत्ति के बीच मनमुटाव और लड़ाई झगड़े के मामले थे, इन मामलों में जब गौर किया गया तो इस मे 60% से भी ज्यादा पति पत्नी ने अपना विवाह प्रेम विवाह की पद्यति से किया था, और इन मामलों में भी लगभग 24 प्रतिशत वो लोग थे जो या तो अभी लिव इन मे रह रहे है या फर शादी से पहले लिव इन मे थे, आंकड़ो की जादूगरी देखिए कि इन मामलों में सबसे ज्यादा वो विवाह भी थे जिनको विवाह किए  हुए कमोबेश 6 महीने भी पूरे नही हुए थे ।

हालांकि जब कॉउंसलिंग कराई गई तो 80% राजी होने वाले वो पति-पत्नी थे जिनका विवाह समाजिक मान्यता के तौर पर हुआ था कहने को अरेंज मैरिज, हालांकि 18 % वो पति पत्नी भी कॉउंसलिंग में आये जिनका प्रेम विवाह था, लेकिन आंकड़ो के अनुसार जिन 18% प्रेम विवाह वालो को राजी किया गया था उनमे 92% लोग फिर सीधे तलाक के लिए कोर्ट पहुंचे।

आंकड़े कभी झूंठ नही बोलते हालांकि यह कहना कतई सही नही होगा कि अरेंज मैरिज ही हमेशा टिकती है, उनमे भी तलाक होते है परिवार उनमे भी टूटता है, लेकिन दोनों प्रकार के विवाहों में अंतर है ।

सामाजिक दबाव:

अरेंज मैरिज में दबाव अपने चरम पर होता है इस तरह के विवाह में केवल पति-पत्नी के बीच ही रिश्ता नही होता बल्कि इसमें  सास, ननद, भाभी, देवर, ज्येठ, ससुर इत्यादि की अच्छी खासी भूमिका होती है, जबकि प्रेम विवाह में ये दबाव न के बराबर होते है या बिल्कुल भी नही होते, सुनने के लिए तो कई बार ऐसा भी मामला आया कि भाभी की इज्जत के ऊपर देवर ने सिर्फ यह मानकर हाँथ डाला कि वह प्रेम विवाह से आई है, कुल मिलाकर यहाँ सामाजिक ताने बाने की  नसें टूटती नजर आती है।

यही दबाव तलाक के समय अपनी भारी भूमिका अदा करता है, उदहारण के लिए अगर एक संयुक्त परिवार में अरेंज मैरिज के तलाक के बीच पति-पत्नी के मनमुटाव को परिवार काफी हद तक कम कर देता है, अगर पति-पत्नी के बच्चे है तो जाहिर है उनका झुकाव दादा-दादी, चाचा-चाची की तरफ होगा, तो ये बंधन विज्ञापन में आने वाले बेहद मजबूत जोड़ वाले पेस्ट से भी मजबूत होगा, वहीँ प्रेम विवाह में इस तरह का कोई वाजिब बंधन होता ही नही है जिसका खामियाजा अगली पीढ़ी को भुगतना पड़ता है।

आखिर क्यों होता है रिश्तों का टकराव:

बेटा और बेटी को पिता अपनी संपत्ति समझता है, और एक तरीके से यह जायज भी है क्योंकि इनकी परवरिश में उसने अपनी उम्र का एक बड़ा हिस्सा जिसमे उसने अपना खून पसीना बहाया है , वह अपनी पीढ़ी के लिए इन्वेस्ट कर चुका होता है, वह लालन-पालन, पोषण में अपना लगभग सब कुछ लगा देता है, भविष्य की कल्पनायें बनाता है, इसी लिए उसकी महत्वाकांक्षा होती है कि उसकी पीढ़ी उसका निर्णय कभी नही टालेगी ( “महत्वाकांक्षा” आज के परिवेश को देखकर कहा गया है, असल मे वह उसकी “उम्मीद” ही होती है)

लेकिन हर बार ऐसा होता नही है , कभी-कभी विचारों की विभिन्नता विद्रोह लेकर उभर पड़ती है फिर चाहे वह प्रेम विवाह सजातीय ही क्यों न हो, पिता उसे शर्मिंदगी और प्रतिष्ठा से जोड़कर देखता है, और वह ऐसा सिर्फ अपनी मर्जी से नही देखता " क्योकि ऐसी किसी घटना के बाद अगर किसी पिता से उसके बेटा और बेटी के बारे के सामान्य सवाल भी करता है तो उसके लिए गोली मारने के लिए जैसा होता है, इसमे उसका कोई दोष होता ही नही, यहां तक कि अगर कोई उस पीड़ित पिता को दो बार देख ले तो उसे लगता है कि वह उस से प्रश्न पूँछेगा और अगर किसी ने  देखकर किसी दूसरी बात को लेकर भी हँस दिया तो मामला बेहद संगीन हो जाता है, आखिर मनोवैज्ञानिक भी इस बात पर तर्क देते है"

पता नहीं कि प्रेम विवाह गलत है या सही, लेकिन एक बात तो  कहनी होगी कि एक बाप जो अपना सब कुछ आप के परिवार के लिए समर्पित कर देता है उसके प्रति भी परिवार के अन्य लोगो की जिम्मेदारी बनती है जिसको पूरा करनी चाहिए!

हालांकि मेरा यह मत पारले जी बिस्कुट की वजह से भी हो सकता है जिसे आप कुकीज और बोर्बन खाने वाले भले ही पसन्द न करे लेकिन नकार नही पाएंगे।

डिस्क्लेमर : ये लेखक के निजी विचार हैं।