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हिंदी पत्रकारिता दिवस 
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हिंदी पत्रकारिता दिवस पर आलेख, पत्रकारिता का पत्रकार मर चुका है ?

दरारों से भरा चौथा स्तंभ

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

कल पूरा दिन हिंदी पत्रकारिता को समर्पित रहा, होना भी चाहिए, हिंदी पत्रकारिता विश्व की उन गिनी चुनी पत्रकारिता में से एक है जिसमे सरकार न्यायपालिका और आमजन के बीच एक मजबूत  पुल का काम किया है , भारत में इस पत्रकारिता ने कलम के सिपाहियों ने सत्ता, शोषण, अपराध, अन्याय के विरुद्ध जमकर ललकार दी है, कभी वह आमजन की समस्याओं को सरकार, अफसरशाही को नींद से जगाने का काम करती आई है तो कभी आमजन में अधिकारों के प्रति जागरूक करने का असम्भव से काम करती रही है, आजादी के समय भी भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी भी इसी विधा के बल पर आगे बढ़े थे ,भारत की आजादी के बाद तक पत्रकारिता एके जिम्मेदारी मानी गयी थी ,लेकिन जैसे ही इसे पेशा मान लिया गया इसका स्वरूप सूर्पनखा की तरह पेश किया जाने लगा, वास्तव में अब गौर से देखने पर पत्रकारिता के चौथे स्तंभ में दरारे ही नजर आती है,
कभी नेता पत्रकार बन जाते है तो तो कभी पत्रकार ही नेता बन जाते है ,सांठ गांठ का पुरजोर समर्थन है, पत्रकारिता महिमामंडन, ओर मीडिया ट्रायल जैसे शब्दों को समाहित करके पूण्य प्रसूता शब्द गंगा को कलुषित करने में जुटे है।

हालांकि यह लेख हिंदी पत्रकारिता दिवस के एक दिन उपरांत सिर्फ इस लिए लिखा गया है कि किसी का मजा किरकिरा न हो जाये,
रामचरितमानस में एक चौपाई है
"सचिव वैद गुरु तीन जो ,प्रिय बोलहि भय आस,
राज धरम तन तीन कर ,होय बेगहि नास"
इस चौपाई को थोड़ा बदलने या कहे इसमे कुछ जोड़ने का वक्त है, या इसी चौपाई को थोड़ा अलग करके पढ़ने का वक्त है
" गुरु, चिकित्सक, और पत्रकार राजश्रयी नही होने चाहिए,
अर्थात शिक्षक अगर राजा के अनुसार शिक्षा देगा तो वह कभी भी राजा को चेतावनी नही दे सकता ,यही स्थिति चिकित्सक ओर पत्रकार की भी है ,
लेकिन आज की पत्रकारिता का गजब ही स्टैंड है , यहाँ पत्रकारिता खेमो में बटी हुई है ,एक जिसको वर्तमान सत्ता में कोई दोष दिखाई नही देता ,दूसरा गुट जिसको केवल विपक्ष ही पसंद है उसे वर्तमान सत्ता में अच्छाई नही दिखती,

आज कल जितने भी दंगे होते है उनमें 70-80 % हाँथ हमारे पत्रकारिता जगत का है, कब किस खबर को हिन्दू-मुस्लिम एंगल से लिखना ओर दिखाना है, कब किस को दूसरा समुदाय लिखकर अपनी नजर बचाना है ये आपको हमारे पत्रकार महोदयों से सीखना होगा,
उदाहरण के तौर पर आप दिल्ली, मुजफ्फरनगर, टोपी, मॉब लिंचिंग की घटनाओं को ले सकते है,
आज पत्रकारिता का मुख्य उद्देश्य धनोपार्जन है, जिसके लिए तमाम प्रकार के उपाय किये जाते है, लाइव डिबेट में दो लोगो को उकसाना, उनसे अनर्गल बयान निकलवाना , फिर कट कॉपी पेस्ट करके उसे चटखारे लेकर सुनाना हमारे शग़ल में शामिल है,
हमने पहले से नैरेटिव सेट किये हुए है, हमे किसके पक्ष में लिखना है, क्या कहना है, इस से हमे क्या फायदा होगा, उदाहरण के लिए आप ट्विटर ही देख लीजिए कल दो पत्रकार अपने अपने पक्षो के लेकर भिड़े हुए थे हिंट के लिए एक पत्रकार जो थोड़े दिनों के लिए नेता बने थे , दाल न गलने पर हिंदी की सत्यता का रस निचोड़ कर सुबह-सुबह ट्विटर पर  डाल रहे थे ,जिन्होंने पार्टी विशेष के बारे में कुछ कहा था,
खैर मुद्दा यह नही है, मुद्दा तो यह है कि आखिर हम पत्रकारिता के जरिये समाज मे क्या दे रहे है? जबकि हमे देना क्या चाहिए,
वर्तमान में स्वस्थ समाज मे स्वस्थ पत्रकारिता की आवश्यकता है, हमे दलगत, व्यक्तिगत, ओर लाभ हानि के परे होकर जनहिताय की पत्रकारिता करनी चाहिए,
"हमारे पास भविष्य की अपार संभावनाएं है , तकनीकी है, पत्रकारिता झोलाछाप से लेकर लैपटॉप और सैटेलाइट तक पहुच चुकी है , लेकिन हमने अपनी पत्रकारिता में पत्रकार को मार दिया है"
यही आशा और उम्मीद है कि जो भी हो भविष्य सुखद हो, हमे वास्तविक पत्रकारिता देखने को मिले, इसी कामना के साथ लेख का अंत करता हूँ।