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महात्मा गाँधी और सुभाष चंद्र बोस
महात्मा गाँधी और सुभाष चंद्र बोस|Google image
ब्लॉग

महात्मा गाँधी को अंग्रेज़ो का दलाल और धूर्त गुंडा किसने कहा 

भारत के लोग जब आजादी की मांग करते हुए जेलों में ठूंसे जा रहे थे, गोली के शिकार हो रहे थे तो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी “भारत छोड़ो आंदोलन” को विफल बनाने के लिए अंग्रेजो की मदद कर रही थी !

Abhishek

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महात्मा गाँधी को मार्क्सवादियों ने ‘अंगेजों का दलाल और पूंजीवाद का सबसे बड़ा धूर्त गुंडा’ कहा था। एक बार नहीं , बल्कि वर्षों तक। आज भी उनके बूढ़े मार्क्सवादी वही मानते हैं । द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान महात्मा गाँधी के अलावा एक और नेता, जो भारतीय कम्युनिस्टों के सबसे अधिक निशाने पर थे, वो नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे !
सीपीआई की पत्रिका से लिया गया चित्र 
सीपीआई की पत्रिका से लिया गया चित्र 
स्कैन । कहानी कम्युनिस्टों की 

कम्युनिस्टों ने नेताजी सुभाषचंद्र बोस को 'तोजो (जापानी तानाशाह) का कुत्ता' और गद्दार कहा था। 1942 -43 के बीच कम्युनिस्ट पार्टी के अख़बार 'पीपुल्स वार' में नेताजी को कुत्ते, राक्षस आदि रूपों में बार-बार चित्रित किया गया था। कम्युनिस्ट की नजर में आजाद हिन्द फौज 'लुटेरों, हत्यारों की सेना थी!

गाली-गलौच भरी ऐसी घृणित भाषा मार्क्सवादी बौद्धिकता का अभिन्न अंग रही हैं। सुभास चंद्र बोस भी विचारधारा से वामपंथी थे, लेकिन कम्युनिस्टों और पंडित जवाहरलाल नेहरू से उनका विचार कई मायनों अलग था।

सुभाष चंद्र बोस के चिंतन में पहले राष्ट्र था !

वामपंथी विचारधारा से प्रभावित होते हुए भी नेताजी के लिए देश सर्वप्रथम था। नेहरू 'अंतरराष्ट्रीयतावादी सोशलिस्ट' थे और नेताजी 'राष्ट्रीयतावादी सोशलिस्ट'! सुभाष चंद्र बोस की प्राथमिकता में हमेशा से ब्रिटिश सरकार को उखाड़ फेंकना था।

महात्मा गाँधी और सुभाष चंद्र बोस में भी वैचारिक टकराव था।1938 में सुभाषचंद्र बोस सभी के समर्थन से ही कांग्रेस के अध्यक्ष बने, लेकिन 1939 में गाँधी जी ने उनका समर्थन नहीं किया, इसके बाबजूद सुभाष चंद्र बोस अध्यक्ष बनने में सफल रहे।लेकिन कांग्रेस के अंदर कुछ ऐसे हालात पैदा कर दिए गए, जिससे न केवल नेताजी को अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा, बल्कि बाद में उन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए उन्हें कांग्रेस से निष्कासित भी कर दिया गया। और सुभाष चंद्र बोस को देश छोड़ना पड़ा।

पंडित जवाहरलाल नेहरू थे सबसे बड़े कम्युनिस्ट !

भारत में वामपंथ के विकास में जितना योगदान पूरी कम्युनिस्ट बिरादरी ने मिलकर किया हैं, उससे कहीं अधिक योगदान पंडित नेहरू और उनके बाद उनकी बेटी इंदिरा गाँधी का रहा है! ऐसा कहना है भारत में कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक रहे फिलिप स्प्रैट का.

  • फिलिप स्प्रैट ने पंडित नेहरू के बारे में लिखा है-
मै जितना समझता था, नेहरू उससे से भी बड़े कम्युनिस्ट थे।नेहरू अपने प्रधानमंत्रित्व काल में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी को अतिरिक्त लाभ उठाने दिया करते थे। वह कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा सोबियत संघ और चीन की सरकार से संपर्क रखने की ओर से आंखे मूंदे रखते थे।इन सरकारों से भारत की कम्युनिस्ट पार्टी को फण्ड मिलता था।नेहरू सरकार के गृह विभाग ने इसे संसद में भी कबूल किया था कि वह कम्युनिस्ट पार्टी को मिलने वाले विदेशी फंड से वाकिफ हैं। पूरी दुनिया में ऐसा कहीं देखने को नहीं मिलता कि सरकार जानते-समझते हुए अपने देश कि एक राजनीतिक पार्टी को मिलने वाले विदेशी चंदे कि ओर से निश्चिंत हो! नेहरू की विदेश नीति कम्युनिज्म का जीता जगता उदहारण था। 

संदीप देव की किताब "कहानी कम्युनिस्टों की " से साभार