उदय बुलेटिन
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राजनीति का भक्ति से ‘कनेक्शन’

भारत की राजनीति से भगवान भी अछूते नहीं 

Ashutosh

Ashutosh

भारत में चुनाव आते ही राजनैतिक पार्टिओं में हलचल बढ़ना एक सामान्य बात है, लेकिन इस बार का चुनाव कुछ ज्यादा ही दिलचस्प होता जा रहा है । मध्यप्रदेश सहित कई राज्यों के चुनाव नजदीक है ऐसे में नेता जनता को कई तरह के प्रलोभन देते हैं और कई तरह के वादे करते हैं | लेकिन इस बार चुनाव में सभी पार्टियां भक्ति की शक्ति पर ज्यादा भरोसा कर रही है ।

पार्टियों के नेता तीर्थ यात्रा पर जा रहे है लेकिन इसमें भक्ति कम राजनीति ज्यादा दिखाई देती है । ये चुनावी भक्त सिर्फ अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए जनता की धार्मिक भावनाओं को अपने वोट में बदलने के लिए मंदिरों , गुरुद्वारे और मस्जिदो के चक्कर लगाते हैं।

जिस राज्य में जिस धर्म के वोटर ज्यादा होते है, उस राज्य में चुनाव आते ही नेताओं का वोटर की संख्या के आधार पर धर्म परिवर्तन होने लगता है ।इन्हें किसी धर्म की चिंता नहीं, चिंता है तो बस वोट बैंक की और वो इसके लिए किसी भी हद तक तुस्टीकरण के लिए तैयार रहते , इससे किसी का फायदा हो या नुकसान उनको फर्क नहीं पड़ता ।

चुनाव जीतते ही वो अपने असली धर्म में आ जाते जिस धर्म का नाम राजनीति है । आज कल एक नेता मध्य प्रदेश के दौरे पर दौरे कर रहे हैं। एक समय सत्ता में रहने पर उनके नेताओं ने हिंदू धर्म के लिए क्या कुछ नहीं कहा, भगवान राम के आस्तितव पर सवाल खड़े किये पर आज वो जनेऊ पहनते हैं खुद को राम भक्त भी कहते , पिछले दिनों महाकालेश्वर कि पूजा की और खुद को शिव भक्त भी घोसित किया । एक और शिव भक्त की खबर बिहार से भी है जो इन दिनों अपनी धार्मिक यात्रा को लेकर काफी चर्चित रहे |

खैर भगवान राम का नाम राजनीत के लिए नया नहीं है, राम के नाम पर सत्ता में आने वाले सत्ता में आते ही राम को भूल जाते है ऐसा आरोप उन पर लगता रहा है ।

अयोध्या मुद्दा इस बार भी चुनाव से पहले जोरदार तरीके से उठाया जा रहा है, जबकि उसका फैसला कई सालों से सुप्रीमकोर्ट में बाँट जोह रहा है । फिर भी उसे हर चुनाव में उठाया जाता है । राजनीत आस्था पर इस तरह हावी है, इसे समझने के लिए एक उदाहरण है, एक पार्टी में रहते हुए कोई भगवान राम पर विवादित बोल बोलता है और कुछ दिन बाद पार्टी बदलते ही वो राम भक्त बन जाता है, उसे ऐसी पार्टी में शामिल कर लिया जाता है जो राम का मंदिर हर हाल में बनाने का दवा करती है ।

असल में राजनैतिक पार्टियों का सिर्फ एक लक्ष्य है ‘सत्ता’ । ‘सत्ता’ ही उनका धर्म है, ‘सत्ता’ ही उनका सिद्धांत है। सिर्फ दिखावे के लिए कोई मंदिर जाता है, तो कोई दरगाह तो कोई मस्जिद तो कोई गुरुद्वारा पहुँच जाता है । सिर्फ दिखावे के लिए कोई शिव भक्त, तो कोई राम भक्त बनता है। नेताओ का मंदिर जाकर पूजा करना ठीक उसी प्रकार है जैसे उनका रैली करना, चुनाव प्रचार करना और दोनों का उद्देश्य एक है ।

जनता को इन चुनावी भक्तो से सतर्क रहना चाहिए जो चुनाव आते ही मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे के चक्कर लगाने लगते है सत्ता मिलते ही ये भक्त, जनता और भगवन दोनों को भूल जाते हैं ।

ये लेखक के अपने व्यक्तिगत विचार है |